फेसबुक विमर्श - अंबेडकर बनाम गांधी


अजीब विडंबना है शाँति के नोबेल की-
मारटिन लूथर किंग को जब शाँति का नोबेल मिला तो उन्होंने सबसे पहले गाँधीजी को याद किया.
इसके बाद जब नेलशन मंडेला को शाँति का नोबेल मिला तो उन्होंने भी सबसे पहले गाँधीजी को याद किया.
और पिछले साल जब बराक ओबामा को शाँति का नोबेल मिला तो उन्होंने भी सबसे पहले गाँधीजी को ही याद किया.
शायद हम ही अपने महानायक को ऐसे समय में भूलते जा रहे है जबकि ऐसे समय में उन्हें याद किया जाना सबसे ज्यादा मौजूं है...
Added by Pukhraj Jangid on October 13, 2010
Surendra Singh, Arun Dev, Himanshu Pandey and 23 others like this.
गंगा सहाय मीणा शांति के संदर्भ में नेल्‍सन मंडेला और बराक ओबामा का नाम एक साथ लेना ठीक नहीं लग रहा. वैसे पुरस्‍कारों की अपनी राजनीति होती है.
October 14 at 12:33am · Like · 2 people
H.s. MeeNa bilkul sahi kha apne m bhi yahi khane wala hi tha.......
October 14 at 12:37am · Like · 1 person
पुखराज Pukhraj जाँगिड़ Jangid आप सही है लेकिन मेरा संदर्भ केवल गाँधीजी को याद करने वालों से है.
October 14 at 12:37am · Like
गंगा सहाय मीणा गांधी जी की जय बजरंग दल वाले भी बोलते हैं
October 14 at 12:38am · Like · 1 person
Jitendra Kumar ‎@GSM: the contradiction of Mandela and Obama itself reveals that Gandhi is not just a name or an ideology anymore..beyond of that this is a hijacked identity.. everyone use it with their convenience. What has been going on in India since long, now Obama does the same.. Apne Apne Gandhi.. in every house there is a Gandhi with their convenience and necessity..
October 14 at 12:39am · Unlike · 4 people
पुखराज Pukhraj जाँगिड़ Jangid शुक्रिया GSM जी और HSM जी........
October 14 at 12:39am · Like
H.s. MeeNa hw r u....
October 14 at 12:40am · Like
पुखराज Pukhraj जाँगिड़ Jangid शुक्रिया जितेंद्र भाई.
October 14 at 12:41am · Like
H.s. MeeNa rchna tbi mhan banti jab usme kavi ka dritikon jalkta h.......
October 14 at 12:43am · Like ·
गंगा सहाय मीणा ‎@Jitendra- सही कहा आपने. यह भी दिलचस्‍प है कि जागरूक दलित समाज के लिए गांधी आदर्श नहीं हैं.
October 14 at 12:44am · Like · 2 people
H.s. MeeNa jai...jai gandhi ji ki....
October 14 at 12:44am · Like ·
H.s. MeeNa kya gandhi dalit samaj ke liye prasangik h tell me......
October 14 at 12:49am · Like · 1 person ·
Vinay K Bhushan PUKHRAJ ji, Aaapse yeh aasha nahin thi. any way ksisi aur ka naam le liye hote. shanti ke agradut bahut hain......
October 14 at 12:52am · Unlike · 2 people ·
गंगा सहाय मीणा सही कहा विनय जी. शांति का नाम आते ही लोग गांधी का नाम लेते हैं, अम्‍बेडकर का कभी नहीं. अगर शांति शोषण सहने का नाम है तो निश्चिततौर पर अंबेडकर उसके पक्ष में नहीं थे. पहले हमें शांति संबंधी धारणा स्‍पष्‍ट करनी चाहिए.
October 14 at 12:58am · Like · 7 people
Manvendra Singh पुखराज जी आपने सही फ़रमाया, लेकिन हम भारतीयों की फीतरत ही ऐसी है कि हम अपने लोगों की महानता स्वीकार करने में हेठी समझते हैं और दूर देश के टूटपुन्झिया लोगों की छोटी से छोटी बात की तारीफ करने में पन्ने के पन्ने रंगने से भी नहीं हिचकते..........
October 14 at 12:59am · Like · 1 person ·
Vinay K Bhushan ‎@ GANGA Sir, aapne aankhe khol di.. unka v jinke samne Gandhi ke alawa aur koi dikhta hin nahin..
October 14 at 1:03am · Like · 1 person ·
Arvind Chouhan ap bilkul sahi hai hum log gandhi ko mah nayak manne say katra rahe hai na jane kayo
October 14 at 1:03am · Like ·
H.s. MeeNa accha comment............
October 14 at 1:05am · Like ·
Rajesh Raj MAHATMA ,SATYA & AHINSA KI BAH AATE HI SBHI LOG EK SUR ME GANDHI KA NAM LENE SE NAHI HICHKTE HAI..........AKHIR KYU?????
October 14 at 1:37am · Like · 1 person ·
Pravin Kumar गुलों में रंग भरे , बादें-नौबहार चले
चले भी आओ ,कि गुलशन का कारोबार चले
................................................
जिस घडी रात चले
जिस घडी मातमी , सुनसान , सियह रात चले
पास रहो
मेरे कातिल, मेरे दिलदार मेरे पास रहो
October 14 at 12:59pm · Like · 1 person ·
Surendra Singh Bapu ko yaad to aise moko par sabhi karte hai par koi bhi shanti ke nobel dene me ki jane wali ghatiya or swarthpurn Rajanit ki alochana or upeksha nhi karta...
badi vidambana hai,Pukhraj Bhai...ye puri duniya bahurupiye ki natak mandali lagti hai...
October 14 at 12:59pm · Like · 1 person ·
Dilip Mandal चीजें दूर से जैसी दिखती हैं वैसी होती नहीं है. इसलिए अमेरिका में बैठा अश्वेत गांधी को लेकर भ्रम पाल सकता है। भारत में दलित-आदिवासी और पिछड़ों के लिए गांधी के मायने अलग हैं। गांधी की मूर्तियां अब सरकार लगाती हैं, जनता ने हाल के वर्षों में उनकी मूर्तियां लगाना बंद कर दिया है। अंबेडकर इस मामले में बेहतर साबित हुए हैं।
October 14 at 2:43pm · Unlike · 6 people ·
Pankaj Chaturvedi and first we killed the gandhi than his views also----
October 14 at 2:44pm · Like · 1 person ·
Dilip Mandal गांधी के विचार हर किसी के लिए न कभी प्रासंगिक थे, न हैं। जिनके फायदे के लिए उनके विचार थे, वे पूजा करें।
October 14 at 2:47pm · Unlike · 6 people ·
Pankaj Chaturvedi agree
October 14 at 2:49pm · Like ·
Sharma Ramakant यहाँ देखने वाले का नज़रिया काम करता है , वैसे गाँधी जी कि प्रासंगिकता इन
दिनों बढ़ती हुई महसूस की जा रही है . जांगिड़ जी आपने अच्छा प्रश्न उठाया है .
October 14 at 3:39pm · Like · 1 person ·
Ritu Ranjan Kumar यह अजीब सी विडम्बना है कि अंतर्विरोधों से भरे गांधीवाद को बार-बार प्रासंगिक बताया जाता है. ऐसा इसलिए ताकि सामाजिक, राजनितिक और आर्थिक बदलाव की गति और दिशा को नियंत्रित किया जा सके. इस देश मे आस्था पर बहुत बल दिया गया है और तर्कपूर्ण आलोचना को हमेशा से दबाया गया है. अम्बेडकर से लेकर भगत सिंह जैसे लोगों ने गांधीवाद से असहमति जतायी थी और वे लोग किसी भी रूप में गांधी से कम नहीं थे.
October 14 at 5:24pm · Unlike · 4 people ·
Pankaj Chaturvedi when we compare a y two personalities, than it is not essential that we mark one below and another higher, relevancy of gandhi and bhagat singh can not be compare on same scale. in history of independence jinna and many characters were fought against imperialism and for independence but when they have started for pakistan than be anti-india for us. my request is to valuate some one should be on over all perspective not on one decision.
October 14 at 5:29pm · Like · 2 people ·
Ritu Ranjan Kumar If we compare Gandhi with personalities like Ambedker and Bhagat Singh then aim is to compare their thoughts for social, political and economic organistion. Both Ambedker and Bhagat Singh crticised casteism and really wanted to eradicate this evil. We are aware of what Gandhi opined about caste system.
It is true that even the ruling party (read Congress) which is assumed as the main bearer of Gandhian legacy can not dare to apply Gandhian theory in practise.
And most importantly, what we wish to assign as relevant is not an absolute thing. Alternatives are available. We test all available alternatives and then decide what is relevant. BTW, in this discussion Jinnah was not relevant.
October 14 at 5:56pm · Like · 2 people ·
Ashok Kumar Pandey Nobel Puraskar dene-lene vaalon aur Gandhi kii vrgiiy pakshdharata ek hii hai bhaai...
October 14 at 6:39pm · Like ·
Sandeep Saurav KUCHH MAMALON ME UNKE VICHAR ADBHOOT THE YAAR ...
October 14 at 8:39pm · Like ·
Meethesh Nirmohi Ambedkaraur Bhagat singh [Gandhi se asahmati rakhane ke karan hee to ] apnee vichardhara ke bal par AAJ BHEE hamare DALIT-VANCHIT SAMAJ MEN heero bane hui hain.Isi tarah Gandhi bhee apnee vichardhara aur darshan ke karan hee AAJ BHEE GANDHI bane huye hai...aur AAJ BHEE ve AMBEDKAR AUR BHAGAT SINGH KEE TARAH HEE HAMARE HEE SAMAJ MEN PRASANGIK BHEE mane jate hain. LUTHAR KING ,MANDELA YA PHIR OMABA RAHE HONGE shanti ka nobal purskar mila to UNHEN sabse pahle SHANTI KE SANDARBH MEN GANDHI HEE YAD AAYE.,aur istarah yad aana bhee swabhavik hee THA..Dalit-vanchiton YA KRANTI ka sandarbh aata to nisandeh hee Ambedkar aur Bhagat SINGH hee yad aate, GANDHI NAHEE. BHAI Pukh Raj jangid ne Shanti ke sandarbh men HEE Gandh ikoMAHANAYAK BATAYA HAI , ISE anyatha nahee liya jana chahiye.Jis tarah se ham abhivakti kee swatantrata kee bat karte hain,unhen bhee to yah swatantrata HASIL HAI.HAMEN YAH NAHEE BHUULNA CHAHIYE.
YAH SACHAI HAI KI ..Jab talak hamre samaj men Ashanti,Hinsha,varg bhed,asamanta, SAMPRDAYIKATA ,DALIT-VANCHIT,SHOSHIT AUR SHOSHAK HAIN TAB TALAK GANDHI , AMBEDKAR AUR BHAGAT SINGH KE VICHAR AUR DARSHAN UPSTHIT RAHENGE...ANYTHA YAH CHARCHA BHEE NIRARTHAK SIDDH HO JAYEGEE.
October 14 at 10:48pm · Like · 2 people ·
Lakhan Mishra BADE AFSOSO KE SATH LIKHNA PAD RAHA KI SHAYED UNKI AKAL MRATAU KE BAD JO LOG BACHE THE WO UNKO YAD HI NAHI RAKHANA CHAHTE THE ?" KYA YAHI HAI GANDHI KE SAPNO KA BHARAT"
October 14 at 10:54pm · Like ·
Ritu Ranjan Kumar इतिहास को गंभीरता से लिया जाए तो अच्छा है. इतिहास से खिलवाड़ घातक हो सकता है. अम्बेडकर का जीवन आज करोड़ों दलितों के लिए प्रेरणा का विषय है. भगत सिंह ने छोटी सी उम्र में जो उपलब्धि हासिल की उससे आज बहुत सारे युवा प्रेरणा लेते हैं. आज सरकारी इतिहास इनके बारे में ज्यादा नहीं बोलता. हाँ, गांधी विस्मृत नहीं हो पाए इसलिए देश की मुद्रा पर उनका चित्र छाप कर देश के कोने-कोने में पहुंचा दिया गया. दूसरी तरफ, सविंधान बनाने वाला महापुरुष आज केवल दलितों का नेता बन कर रह गया है. रही बात विरोध की तो अम्बेडकर के खिलाफ आमरण अनशन पर गांधी बैठे थे और भगत सिंह की सजा के समय अंग्रेजों से समझौता गांधी ने ही किया था.
October 14 at 11:15pm · Like · 2 people ·
Ashutosh Partheshwar ‎@दिलीप मंडल साहब, गांधी ने अपनी पूजा कभी नहीं चाही, न ही उनकी इच्छा अपना कोई वाद ही चलाने की थी। और इससे फर्क नहीं पड़ता कि सरकारें गांधी की प्रतिमाएँ लगवा रही हैं या नहीं। प्रतिमाओं के लगवाने से यदि किसी की महत्ता बढ़ जाती तब क्या बात थी !!! मायावती अंबेडकर की प्रतिमा लगवा रही हैं, भला है । महत्ता उनकी बढ़ेगी!!
यह भी स्पस्ट रखने की जरूरत है कि गांधी के लिए शांति शोषण को सहने का नाम नहीं है, वह व्यक्ति तो शोषण के खिलाफ ही लड़ाई लड़ता है, उसकी सफलता और असफलता का मूल्यांकन आप करें,पर उसकी नियत पर शक न करें।
बहुत आसान जुम्ला है, वर्गीय हित , और यह कहना कि जिनका वर्गीय हित गांधी से सधता हो, वे गांधी की पूजा करें....... हाँ, जब नोआखली और बिहार में दंगे हो रहे थे, तो उस आग में जलने वालों की पीड़ा को अपने पर महसूस करते हुए 79 साल की उम्र में भी वह व्यक्ति अपने किस स्वार्थ के लिए, किस लोभ के लिए, उस आग से जूझ रहा था, क्या इसलिए कि उसकी इच्छा नोबल पाने की थी, या एक मसीहा बन जाने की।
अपने छोटे स्वार्थ और छोटी राजनीति से हम ऐसे ही तर्क प्रस्तुत करेंगे । और, यह एक अकेला उदाहरण नहीं है। इससे कोई इंकार नहीं करेगा कि उनमें कोई अंतर्विरोध और सीमाएँ न थीं पर शब्दों के प्रयोग मे इतनी बदहवासी अच्छी नहीं।
और सीखना चाहें तो किसी से भी सीख सकते हैं, गांधी से सीखने के लिए तो एक मेरी एक उम्र बहुत कम है, आपकी नहीं कहूँगा! पर जब यह मान लें कि हमारा ज्ञान ही अंतिम है तो ......
गांधी की सीमाओं को कई दूसरे लोग पूरा करने का प्रयास करते हैं, अंबेडकर और भगत सिंह उनमें से प्रमुख हैं ।
October 14 at 11:35pm · Like ·
Ritu Ranjan Kumar ‎"गांधी की सीमाओं को कई दूसरे लोग पूरा करने का प्रयास करते हैं, अंबेडकर और भगत सिंह उनमें से प्रमुख हैं."

बस यहीं गांधीवादी धर लिए जाते हैं. गांधी का रास्ता अलग था- राजनीति में धर्म का मेल, औद्योगिक सभ्यता का विरोध, जमींदारों और पूंजीपतियों के प्रति सहानुभूति, वर्णव्यवस्था का समर्थन आदि आदि. भगत सिंह और अम्बेडकर के पास समाज के लिए कुछ ठोस था जो तार्किक था. वैसे, अम्बेडकर को जो सिर्फ दलित नेता मानते हैं उनकी जानकारी के लिए बता दिया जाए कि अम्बेडकर ने मजदूरों और औरतों की भलाई के लिए भी बहुत प्रयास किया था.
ग्राम्शी ने बताया है कि किस प्रकार सत्ताधारी वर्ग सांस्कृतिक वर्चस्व के जरिये अपनी वैधता स्थापित करता है. ये बहुत सटीक बात है. दलितों को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को प्रस्तुत करने का पूरा अधिकार है. अगर मायावती मूर्तियां बनवा रहीं हैं तो इसमें गलत क्या है.
October 14 at 11:56pm · Like · 3 people ·
Asrar Khan Gandhi ji ka naam Log iss liye lete hain kenvki Barak obama jaisse log Bharat ko ussi keechad mein fansa hua dekhna chahte hain. Asal mein bharat ko Gandhi ki nahin Bhagat singh ki jaroorat thie...Tab bharat ab tak vikshit desh ban gaya hota na ki aaj jaissa Vanshvaad aur Kuposhad tatha gareebi beimani Crime ,Bhrashtachar ke bhanwar mein Ek bechan aur Ashantusht logon ka desh bankar ....
October 15 at 12:06am · Like · 1 person ·
पुखराज Pukhraj जाँगिड़ Jangid आधुनिक भारत की विडंबनाओं को सही से समझने, समझाने और उस पर अमल के लिए अंबेडकर जरूरी ही नहीं वरन अनिवार्य है और उसका कोई विकल्प नहीं हो सकता. और प्रासंगिकता संवादहीनता से नहीं उपजती, वह हमेशा संवाद चाहती है. अंबेडकर और गाँधी के बीच संवाद कभी खत्म नहीं हुआ था. हाँ, गाँधीजी के निधन ने उसपर विराम अवश्य लगाया लेकिन उसे खत्म तो हमने किया है. तमाम असहमतियों के बावजूद वो दोनों तो आजीवन एक-दूसरे के ध्रुव-संवादी बने रहे थे इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए. रही बात बजरंगदल वालों द्वारा गाँधी की जय बोलने की तो हमारे देश में भगतसिंह के नामलेवाओं, कामलेवाओं और दामलेवाओं की लंबी परंपरा रही है. हाँ, भगतसिंह, धर्म आदि कई मसलों पर गाँधीजी से घोर असहमतियाँ मेरी भी है लेकिन अपनी तमाम असहमतियों के बावजूद कहना चाहूँगा कि उनका रास्ता कभी भी बजरंगदल वालों वाला रास्ता नहीं था और न ही बजरंगदल वाले गाँधीजी को अपना आदर्श मानते है और न मैंने ऐसा सुना. ‘अहिंसा’ के रास्ते पर चलने के लिए जिस अद्मय साहस की जरूरत होती है वह ‘हिंसा’ के माध्यम से प्रदर्शित साहस से कमतर नहीं है. कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता है क्योंकि ताकतवर तो अपनी बात ताकत के बूते मनवा लेगा लेकिन कमजोर क्या करे !!! उस समय जब कोई हाशिए पर मौजूद सबसे कमजोर और सबसे अंतिम कतार में खड़े आदमी (जिसमें दलित, आदिवासी और स्त्री भी शामिल है) की बात सुनने तक को तैयार तक न था और हिंसा के माध्यम से वह अपनी बात रखने और कहने में असमर्थ था ऐसे विपरित समय में उन्हें गर्वसहित अपनी बात रखने का जो अहिंसात्मक (अहिंसा का) और असहयोगात्मक (असहयोग का जो) रास्ता गाँधीजी ने सुझाया था वह अपने आप में औरों के साथ-साथ हाशिए की तमाम अस्मिताओं के लिए भी मील का पत्थर सिद्ध हुआ...तमाम मतभेदों के बावजूद यहाँ अंबेडकरजी और गाँधीजी एकदम अलग तो नहीं ही है. यहाँ गाँधीजी के बगैर न तो अंबेडकरजी को समझा जा सकता है और न अंबेडकरजी के बगैर गाँधीजी को.
October 15 at 2:48am · Unlike · 2 people ·
पुखराज Pukhraj जाँगिड़ Jangid सुरेंद्र जी, एकदम सही फरमाया आपने कि- ‘ये पूरी दुनिया बहरूपियों की नाटकमंडली लगती है.’
October 15 at 2:48am · Like ·
पुखराज Pukhraj जाँगिड़ Jangid ‎@विनय भाई, जिन तीन नोबेल शाँति पुरस्कर्ताओं का उल्लेख मैंने किया है वे तीनों अश्वेत है. मारटिन लूथर किंग और नेलशन मंडेला तो अपने-अपने समय में सकारात्मक बदलावों और प्रतिरोध की वैश्विक संभावनों के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक रहे है और आज भी है. जैसा कि मैंने स्वीकार किया कि- “आप सही है लेकिन मेरा संदर्भ केवल गाँधीजी को याद करने वालों से है.” मुझे बराक ओबामा का नाम उनके साथ नहीं लेना चाहिए था, बराक ओबामा का नाम मैंने एक अमेरिकी होने से कहीं अधिक अश्वेतों के वैश्विक संभावनों के समकालीन प्रतीक होने के कारण लिया. आपको बुरा लगा क्षमाप्रार्थी हूँ. शुक्रिया.
October 15 at 3:18am · Like · 1 person ·
Vinay K Bhushan ‎@ Pukhraj bhai, buri chizein buri hin rahti hai jabtak usko bade level par sudhara nahin jaye, isme aapki koi galti nahin hai. Historian logon ne galti kiya hai unko aaj ki generation se kshama mangni chahiye
October 15 at 4:28am · Like ·
Ashutosh Partheshwar ‎@ पुखराज जी, ओबामा का आकर्षण और उसकी संभावनाएँ एक अश्वेत के रूप में ही देखी और चाहिए गई थीं, एक ऐसे समाज में जिसकी छवि ऊपर से भले ही उदारतावादी और आधुनिक है, उसकी विडंबनाएँ ओबामा के साथ न केवल प्रत्यक्ष हुई थीं और बल्कि एकबारगी कमजोर भी हुई थीं। क्या ओबामा को बहिष्कृत करने के पीछे नोबल ही नहीं है !!!
मार्टिन लूथर किंग और मंडेला के साथ उनका नाम न लेना, एक बात है, पर मैं अभी भी मानता हूँ कि यह इतना अयाचित और लज्जास्पद नहीं है जिसके लिए क्षमा की बात आए ।
कोई विचार पूर्ण नहीं हो सकता, यह हमारी जवाबदेही है कि हम उनमें संवाद की संभावनाएँ तलाश सकते हैं या नहीं, आपने गांधी और आंबेडकर के परस्पर संबंध में उचित टिप्पणी की है। गांधी की अहिंसा का आपका विश्लेषण सटीक है।
पूरी विनम्रता से मैं बस यही कहना चाहूँगा, कि एक को बड़ा दिखाने के लिए दूसरे को छोटा दिखाने में हमारा ही छुटपन दिखता है। हमें इस बहस से बाहर निकलना होगा कि कौन अधिक बड़े थे । यह बहस के मोर्चे से भागने का उपक्रम नहीं है बल्कि अपनी जरूरत को पूरा करने की कोशिश है । मैं चीजों को इसी तरह देखता हूँ ।
October 15 at 10:26am · Like · 1 person ·
Ritu Ranjan Kumar शिक्षा से ही हमारी सोच बनती (और बिगड़ती भी) है. आजादी के बाद जो इतिहास स्कूलों और कॉलेजों में परोसा गया उसके पीछे मकसद आजादी में कांग्रेस की भूमिका को प्रचारित करना था. एक गैर संवैधानिक पद – “राष्ट्रपिता”, पर “बापू” को आसीन करके ये बताया गया कि आजादी सिर्फ उनके ही प्रयासों से संभव हो पाई और गांधी नहीं होते तो आजादी नहीं मिलती या बहुत देर से मिलती. अब ये देश ठहरा आस्थावान. “राष्ट्रपिता” की भूमिका पर कोई बहस कैसे हो सकती थी? लेकिन समय बदल रहा है और इस बदलते समय की उपेक्षा नहीं की जा सकती है.
October 15 at 12:50pm · Like · 3 people ·
Dilip Mandal ‎@ Ritu Ranjan Kumar, आपने काफी गंभीर और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। आपकी बातों से इस विवाद को समझने का नया रास्ता मिला है। धन्यवाद।
October 15 at 12:52pm · Like ·
Ritu Ranjan Kumar दिलीप साहब आपका धन्यवाद. मैंने जो टिपण्णी की है वो कोई नई बात नहीं है और सभी को पता है. मैंने तो बस टिपण्णी करने का साहस (या दुस्साहस) भर किया है.
October 15 at 1:23pm · Like · 1 person ·
Ashok Kumar Pandey मैंने पहले भी कहा की नोबेल देने -लेने वालों और गांधी की वर्गीय पक्षधरता एक जैसी है. 'हिंद स्वराज' की समीक्षा में मैंने जब इसे 'हिन्दू पुनरुत्थानवाद का घोषणापत्र ' कहा था तो लोगों ने बहुत आपत्ति की थी.. अब यहाँ जो बातें सामने आयीं हैं उनसे मुझे बहुत बल मिला है...गांधी पूंजीवादी मीडिया और जनविरोधी सरकारों के लाडले हैं .
October 15 at 2:03pm · Like · 2 people ·
Ashutosh Partheshwar जब चीजों को समय-संदर्भ से काट के देखेंगे तो 'हिन्द स्वराज' क्या उसी दौर की किताब 'सोजे वतन' भी 'ह्ंदु पूनरुत्थान को घोषणापत्र' दिखाई देगा।
बापू को चाहने वाले कॉंग्रेस की पृष्ठभूमि से अलग और उसकी 'राजनीति' से मुख्तालिफ़ विचार वाले लोग भी हो सकते हैं, और वे जो यह मानते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में केवल गांधी की भूमिका नहीं थी, वैसे ही जैसे केवल आंबेडकर और भगत सिंह की भी नहीं थी..... अंग्रेजों ने मेरे गाँव के एक टोले को पूरी तरह घेर कर जला दिया, तो वे लोग जिन्होंने इसकी कीमत चुकाई, उनका भी महत्व है। यह तो सोचने वाली बात है कि वामपंथी पृष्ठभूमि से आने वाले लेखकों और संपादकों ने जब एन सी ई आर टी की किताब तैयार की तो ऐसा कैसे हो गया कि सबसे अधिक तस्वीरें नेहरू की ही दिखाई दीं।
गांधी को बापू या राष्ट्रपिता कॉंग्रेस ने नहीं बनाया, और न आजादी के बाद उन्हें इस तरह पुकारा गया। यह हमेशा याद रखना चाहिए।
October 15 at 5:10pm · Like · 1 person ·
Ritu Ranjan Kumar बापू के चेलों से सिर्फ एक सवाल- डरबन से प्रिटोरिया जा रहे गांधी को अगर रेलवे के फर्स्ट क्लास के डिब्बे से गोरे बाहर नहीं निकालते तो क्या देश आजाद नहीं होता?
October 15 at 5:50pm · Like · 2 people ·
Ashok Kumar Pandey हर चीज़ को वामपंथ को गरियाने का मौक़ा न बनाईये. अगर आपने वह आलेख पढ़ा हो तो तर्क सहित बताईये की कैसे वह विवेचना समय-सन्दर्भ से कटी है और कैसे वर्ण-व्यवस्था का समर्थन, जाति प्रथा के खिलाफ आये बिल का विरोध, महिलाओं के घर से बाहर निकलने का विरोध, ब्राह्मण आधारित शिक्षा पद्धति का समर्थन, धार्मिक पाखण्ड का बचाव और आधुनिक हर चीज़ का विरोध पुनरुत्थान का समर्थन नही है. यहाँ यह भी बता दूं कि गांधी ने कभी इस किताब को डिसओन नही किया.

रहा सवाल बापू का तो जिन्हें पोरबंदर और सौराष्ट्र की भाषाई समझ है वे जानते हैं कि वहां 'बापू' किसे कहा जाता है. जिस तरह का धार्मिक रहस्यवाद उन्हें केंद्र में रखकर कांग्रेस के हिंदूवादी तत्वों ने चलाया उसने हिन्दी क्षेत्र में उनकी यह देव छवि रची जो उनके साथ ही ख़त्म हो गयी. राष्ट्रपिता का नाम उन्हें किसने दिया यह सब जानते हैं. कांग्रेस ने उन्हें सरकारी प्रश्रय जिस तरह दिया वह उनके नोट से दीवार तक छाये रहने का कारण बना.
October 15 at 5:51pm · Like · 2 people ·
Ashok Kumar Pandey और गांधी जी उर्फ़ बापू ने पहली बार आजादी की मांग कब की?
October 15 at 6:00pm · Like ·
Ritu Ranjan Kumar द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सारी दुनिया में उपनिवेशवाद का पतन शुरू हुआ. एशिया में भारत, श्रीलंका और हिन्दचीन के देशों की स्वतन्त्रता इसी विऔपनिवेशिकरण की प्रक्रिया थी. भारत का शासन अंग्रेजों के लिए नैतिक और आर्थिक रूप से कठिन हो चला था. अंग्रेजों ने तो भारत को नियत समय के कुछ पहले ही छोड़ने की घोषणा कर दी थी. देश की स्वतन्त्रता में गांधी और कांग्रेस की भूमिका को बढ़ा-चढ़ा कर बताने वालों के लिए इतिहास की समझ आवश्यक है. रौलेट, असहयोग, सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलन, कोई भी सफल नहीं हुआ.
October 15 at 6:29pm · Like · 1 person ·
Ashutosh Partheshwar जो नहीं हो सके पूर्ण काम उनको प्रणाम !
October 15 at 10:46pm · Like ·
Ritu Ranjan Kumar “जो नहीं हो सके पूर्ण काम उनको प्रणाम”
तो अब अपनी आस्था को दीजिए विश्राम
और हो जाए अब यहीं पर युद्ध विराम
हम मचा नहीं रहे कोई कोलाहल कोहराम
और चाहते भी नहीं कोई वाक्-युद्ध-संग्राम
जिसने भी किया है सच्चे दिल से काम
लोग याद करेंगे और लेंगे उसका नाम
आप कीजिये अधूरे काम को प्रणाम!!!
October 15 at 11:53pm · Like ·
गंगा सहाय मीणा ‎''कांग्रेस और गांधी के लिए 'अस्पृश्यों की मुक्ति' एक अंदरूनी समस्या थी जबकि अंबेडकर के लिए सर्वाधिक अहम समस्या। जमींदारी प्रथा की तरह जाति प्रथा और अस्पृश्यता का समाधान गांधी हृदय परिवर्तन में खोजते थे। वे वर्णाश्रम को बनाये रखते हुए अस्पृश्यता खत्म करने के पक्षधर थे जबकि अंबेडकर वर्ण और जाति को ही अस्पृश्यता की जड मानते हुए इनका खात्‍मा जरूरी समझते थे। गांधी के 'दयाभाव' के बरक्स अंबेडकर अस्पृश्यों के लिए अधिकारों की मांग करते हैं।''
-''अंबेडकर और गांधी - संवाद जारी है'' से.
लिंक-
http://www.visfot.com/index.php/seminar/2996.html
October 17 at 2:44am · Like · 1 person
पुखराज Pukhraj जाँगिड़ Jangid तो संवाद जारी है, जानकर बेहद खुशी हुई... इस अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण लिंक को साझा करने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया गंगासहायजी. पढकर आत्मा प्रसन्न हुई. बहुत ही बढिया, महत्त्वपूर्ण, प्रासंगिक और सारगर्भित लेखन के लिए तहेदिल बधाई... क्या मैं इसे ब्लॉग पर साझा कर सकता हूँ?
October 17 at 3:23am · Like ·
गंगा सहाय मीणा शुक्रिया. जरूर. मुझे खुशी होगी.
October 17 at 3:24am · Like
पुखराज Pukhraj जाँगिड़ Jangid आपका बहुत-बहुत शुक्रिया गंगासहायजी. जब बात निकली है तो दूर तलक जानी ही जानी चाहिए...
October 17 at 3:42am · Like ·
Ravi Malik ha ha ha ha ha
October 17 at 11:43am · Like ·


भारतीय रुपये के नए चिन्‍ह को अंग्रेजी और डॉलर की तर्ज पर हिन्‍दी में भी संख्‍या से पहले लिखा जा रहा है. मुझे लगता है हिन्‍दी में इसे संख्‍या का बाद लिखा जाना चाहिए. उदाहरण के लिए- 'यह किताब रुपये 50 की है' की जगह 'यह किताब 50 रुपये की है' लिखा जाना चाहिए. आप क्‍या कहते हैं?
Added by Ganga Sahay Meena on November 13
Kim YongJeong, Anoop Aakash Verma, Manoj Chhabra and 37 others like this.

Arbind Kumar Mishra Sahi kaha aapne,Hindi Bhasha ki apni prakriti hai.
November 13 at 10:52pm · Unlike · 2 people
Wekas Inquilab अब क्या किया जाये ,ये निशान ही देख लीजिये जब वो बीच वाला डंडा उनकी नक़ल करके लगाया गया है तो इस्तेमाल भी तो उनकी नक़ल करके ही किया जायेगा | नक़ल करने में हमसे अच्छा कोई नही कुछ दिनों में शायद 'रुपये ५०' बोलने की भी आदत डाल ही लेंगे |
November 13 at 11:00pm · Unlike · 5 people
Veer Aditya yes!
It is Hindi Syntax Respected!
November 13 at 11:02pm · Like
Wekas Inquilab इस निशान की जगह अगर "रु " होता तो शायद इसकी अंतर्राष्ट्रीयता कम हो जाती |
November 13 at 11:05pm · Like · 1 person
सुयश सुप्रभ Suyash Suprabh गंगा सहाय जी, अंग्रेज़ी की वाक्य संरचना, शैली आदि से हिंदी 'आतंकित' रहती है। इसकी एक वजह यह है कि हिंदी में मौलिक लेखन को बढ़ावा नहीं दिया जाता है। मीडिया को मुनाफ़े से मतलब है और सेठ, नेता आदि अपनी बात जिस हिंदी में लोगों तक पहुँचाते हैं उससे उनका काम तो निकल जाता है लेकिन भाषा कराहती रह जाती है। पूँजी के साम्राज्य में न तो खेत-खलिहान सुरक्षित हैं न भाषा।
November 13 at 11:31pm · Unlike · 9 people
गंगा सहाय मीणा सही कहा आपने. दरअसल यह हमारी गुलाम मानसिकता का प्रतीक है. यह पूंजी के साथ सांस्‍कृतिक साम्राज्‍यवाद का दौर है.
November 13 at 11:36pm · Like · 7 people
Arbind Kumar Mishra Lekin Hindi bhasha ke wakya vinyas ko bachana hamara hi kartavya hai
November 13 at 11:37pm · Unlike · 4 people
Manohar Das दरअसल वाणिज्य और अर्थशास्त्र को भाषा से जोड़ा जाना उचित नहीं है. सब कुछ सुविधा को ध्यान में रखते हुए किया गया है. अग्रणी और सर्वेसर्वा की बात मानी जाती है. जब हमें भारत को India कहने से एतराज़ नहीं तो, यह तो प्रश्न को बेमानी है. भारत का पूरा ढांचा ही मुगलों और ब्रिटिश का दिया है . क्या क्या बदलोगे ? बेहतर है इसे ढंग से चला पाए वही काफी है.
November 13 at 11:54pm · Like · 4 people
Geeta Rana gsm sir kissi baat ko discuss karwana to koi aapse seekhe :) :) :)
ye bhi ek kala hai , congrates !!!
November 14 at 12:41am · Like · 3 people
Arbind Kumar Mishra Mai to abhi bhi yahi kahoonga ki ank ke baad hi is pratik ka prayog sab karen .
November 14 at 12:47am · Unlike · 2 people
Prithvi Parihar सही है लिखा तो तो यही जाना चाहिए कि किताब 50 रुपये की है.
November 14 at 8:41am · Unlike · 3 people
Uday Prakash लेकिन जब 'लोगो' (logo) या 'चिह्न' (sign) बनते हैं, तो वे शब्दों को विस्थापित (replace) करते हैं। ऐसे में वाक्य-संरचना (syntax) में लागू होने वाले व्याकरण के नियम, उन पर लागू नहीं होते। 'प्रत्यय' अथवा 'पूर्व-सर्ग' (prefix) या 'अंत:-सर्ग' की तरह उन पर विचार करना (मेरी समझ से) ठीक नहीं होगा। डालर ($) या यूरो (e) वगैरह के चिह्न भी 'अंकों' के पहले इस्तेमाल होते हैं। इसलिये इस चिह्न को भी, रिज़र्व बैंक द्वारा स्वीकृति मिलने के बाद, अंतरराष्ट्रीय मानक-चिह्नों की तरह ही, अंक के पहले प्र्योग किया जाना चाहिए। 'लोगो' या 'चिह्न' के संदर्भ में 'हिंदी' और 'अंग्रेज़ी' जैसे भाषा विभेद का सवाल उठाना भी बहुत तार्किक नहीं होता। यह चिह्न एक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा मानक (currency sign) है, जो कि भाषेतर है और चित्रात्मक (pictorial) है। उदाहरण के लिए आप यह देखें :
@ $70,567/ 10% उपभोक्ता. ( सत्तर हज़ार पांच सौ सरसठ डालर के मूल्य से प्रति दस प्रतिशत उपभोक्ता)
उपर्युक्त वाक्य को आप पढ़ सकते हैं। हिंदी वाक्य -विन्यास का व्याकरण यहां लागू नहीं है। ऐसा मेरी समझ है।

4
November 14 at 9:02am · Unlike · 9 people
Sagar Jnu GYAAN VARDHAN K LIYE THNX SIR
November 14 at 10:06am · Like
Ghufran Raghib mujhe to hindi र se objection hai.
November 14 at 11:05am · Like
Shams Equbal aapka khayaal theek hai. zabaan bhi durust ho jaeegi aur ghulamana zehan se nijaat bhi
November 14 at 11:22am · Unlike · 1 person
Priyankar Paliwal उदय जी से पूर्ण सहमति है . अभी भी बैंकिंग/वाणिज्य आदि में सुरक्षा के हिसाब से भी रुपया पहले लिखा जाता है और मात्र या केवल से समाप्त किया जाता है. इससे वर्णित/लिखित राशि में दोनों ओर से टेंपरिंग की गुंजाइश समाप्त हो जाती है. मुद्रित प्रपत्रों तथा चैक आदि में भी इससे यह सुविधा होती है कि चिह्न के आगे लिखी धनराशि के लिए इच्छित/उपयुक्त स्थान का सुरक्षित उपयोग किया जा सकता है.
November 14 at 11:29am · Like · 4 people
सुयश सुप्रभ Suyash Suprabh यूरोप के कई देशों में यूरो का चिह्न संख्या के बाद लिखा जाता है। इस विषय पर विस्तृत जानकारी निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है :

http://en.wikipedia.org/wiki/Linguistic_issues_concerning_the_euro

कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत हैं :

अल्बानियाई 3,14 €
चेक 3,14 €
पुर्तगाली 3,14 €

जब इन भाषाओं से अंग्रेज़ी में अनुवाद होगा तब अंग्रेज़ी के मानक, परंपरा आदि का ध्यान रखा जाएगा। लेकिन भारत में यह काम अनुवाद से पहले ही हो जाता है। हम अपनी भाषा में अंग्रेज़ी के मानको को मान्यता देने में लग जाते हैं। भारत में संख्या के बाद मुद्रा चिह्न के प्रयोग को मान्यता मिलने की संभावना बहुत कम है। हमारी भाषा इतनी सशक्‍त नहीं है कि वह चिह्नों का प्रयोग अपनी प्रकृति के अनुसार करे। उसे हर बात के लिए अंग्रेज़ी मानकों की आवश्यकता होती है। अंग्रेज़ी के मानको को अंतर्राष्ट्रीय मानक मानने की भूल बहुत-से बुद्धिजीवी करते हैं।

अंग्रेज़ी का आतंक इतना है कि हम अमेरिकी के बदले अमेरिकन, योग के बदले योगा, राम के बदले रामा आदि शब्दों का प्रयोग करने लगे हैं। अगर आप ठीक से याद करें तो आप जान जाएँगे कि अंतिम बार आपने कब 'योग' को 'योगा' कहा था...
November 14 at 12:09pm · Unlike · 2 people
Uday Prakash लेकिन सुयश जी, फ़्रांस, पुर्तगाल जैसे देश भी हमारे औपनिवेशिक शासक रह चुके हैं, उनमॆं चिह्न संख्या के बाद आता है। दूसरी तरफ़ ब्रिटेन, अमेरिका, हालैंड, जर्मनी जैसे देश हैं, जिनकी वितीय-वाणिज्यिक हैसियत विश्व-अर्थ व्यवस्था में हम जानते हैं। इनमें से ब्रिटेन भी हमारा पूर्व शासक रह चुका है।
अब अगर हम इस चिह्न का उपयोग अंक के पहले करें या बाद में, वह तो 'अनुकरण' ही होगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि रिजर्व बैंक का यह फ़ैसला किसी का 'अनुलरण' हो ही नहीं, बल्कि अपनी सुविधा के आधार पर लिया ग्या निर्णय हो?
दूसरे, हिंदी या 'भारतीयता' जैसी भावना, अक्सर मैंने देखा है कि बहुत ठोस आधारों और तर्कों पर टिकी नहीं होती।
अगर हम खाने-पीने से लेकर पहनने-ओढ़ने और आवास से लेकर परिवहन, संविधान से लेकर समूचे लोकतांत्रिक ढांचे तक के निर्माण में संसार के अन्य विकसित देशों से कुछ न कुछ हासिल किया है, तो सिर्फ़ 'करेंसी' के चिह्न तक में इसे परिसीमित करना बहुत सही नहीं लगता।
अगर मज़ाक में कहा जाय तो क्या आलू, अमरूद, तंबाकू, मिर्च, टमाटर, चौलाई साग, बथुआ आदि खाते हुए हम क्या कभी सोचते हैं कि ये तो पुर्तगालियों की देन है? दुखद ही सही पर सच यही है कि टेक्नालाजी से लेकर अर्थव्यवस्था तक में और विचार से लेकर समाज-व्यवस्था तक में हम बहुत पिछड़ चुके हैं। हमारी मौज़ूदा अर्थनीति भी तो अमेरिका और यूरोप के अनुकरण के ही आधार पर ही निर्मित है! फिर भला रुपये का लोगो किस मौलिक तरीके से बनायें और फिर उसे कहां लगायें...?
November 14 at 2:04pm · Unlike · 8 people
Arun Dev ‎"आलू, अमरूद, तंबाकू, मिर्च, टमाटर, चौलाई साग, बथुआ आदि खाते हुए हम क्या कभी सोचते हैं कि ये तो पुर्तगालियों की देन है?" उदय जी वास्तव में कभी यह नहीं लगा कि हम कोई पुर्तगाली चीज खा रहे हैं.
इनके बिना तो आज के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती.
November 14 at 2:42pm · Unlike · 4 people
सुयश सुप्रभ Suyash Suprabh उदय जी, शायद विषयांतर हो रहा है। आपने लिखा था - "डालर ($) या यूरो (e) वगैरह के चिह्न भी 'अंकों' के पहले इस्तेमाल होते हैं।" इसे तथ्य नहीं माना जा सकता है। कई यूरोपीय देशों में मुद्रा चिह्न को संख्या के बाद लिखा जाता है। कृपया इसे औपनिवेशिकता के संदर्भ में नहीं देखें। इससे संबंधित जानकारी आप निम्नलिखित लिंक पर देख सकते हैं :

http://en.wikipedia.org/wiki/Linguistic_issues_concerning_the_euro

क्या हिंदी में मौलिकता लाने का प्रयास व्यर्थ है? हम कब तक इसे अंग्रेज़ी की गरीब सहेली बनाए रखेंगे? मीडिया में हिंदी अनुवाद की भाषा बन गई है। अंग्रेज़ी से शब्द लेने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन हर बात में अंग्रेज़ी मानको की दुहाई देना गलत है। वैसे भाषा तो प्रयोग से बनती-बिगड़ती है। जनता जिस रूप को स्वीकार करेगी वही रूप मानक बन जाएगा।

हिंदी की बात हमेशा भारतीयता से संबंधित नहीं होती है। संसार की हर भाषा दूसरी भाषाओं से शब्द लेती है। अंगेज़ी ने भी कई भाषाओं से शब्द लिए हैं। लेकिन अंग्रेज़ी उन शब्दों को अपनी प्रकृति के अनुसार ढाल लेती है। हिंदी में ऐसा नहीं हो पाता है। एक उदाहरण देना चाहूँगा। अंग्रेज़ी ने हिंदी से jungle शब्द लिया है। अंग्रेज़ी में इसका बहुवचन jungles होता है, न कि junglon (हिंदी व्याकरण के अनुसार) । हिंदी ने अंग्रेज़ी से 'चैनल' शब्द लिया, लेकिन बहुत-से लेखक इसे बहुवचन में 'चैनल्स' लिखते हैं। हिंदी की प्रकृति के अनुसार इसे 'चैनल' या 'चैनलों' लिखना चाहिए। मौखिक अभिव्यक्ति में हिंदी बोलते समय 'चैनल्स' का प्रयोग अनुचित नहीं है। हिंदी बोलते समय अंग्रेज़ी शब्दों का उच्चारण अकसर हिंदी के अनुसार नहीं होता है। यह हिंदी के मौखिक प्रयोग की सामान्य प्रवृत्ति है। लेकिन लिखित अभिव्यक्ति में एकरूपता, शब्द निर्माण आदि को ध्यान में रखते हुए भाषा के रूप को व्यवस्थित करने की कोशिश की जाती है। यह कोशिश हिंदी में बहुत कम दिखती है। इसकी वजह यह है कि हम अपनी भाषा को अंग्रेज़ी के सामने नतमस्तक देखना गलत नहीं समझते हैं।

भाषा में मौलिकता की बात जीवन से जुड़ी हुई है। इसे हमेशा भारतीयता से जोड़ना तर्कसंगत नहीं है। मुझे फ़ेसबुक पर हिंदी की बात करने पर लोगों से यह सुनना पड़ा कि मैं दक्षिणपंथी या संघी हूँ। बाद में मेरे संदेश पढ़कर कुछ लोगों की राय बदली, लेकिन बहुत-से लोग शायद अभी तक नाराज़ हैं।
November 14 at 3:35pm · Unlike · 3 people
Kamlesh Kumar Diwan sahi kaha hai,koi or shubh chinha hona chahiye thaa
November 14 at 4:58pm · Like · 1 person
Manish Ranjan sahmat
November 14 at 5:01pm · Like · 1 person
सुयश सुप्रभ Suyash Suprabh संतोष जी, यह सच है कि भारत के विश्वविद्यालयों में सेमिनारों की बहस प्राय: दिशाहीन होती है। इसमें चाटुकारिता भी खूब देखने को मिलती है। लेकिन भाषा का सवाल प्रासंगिक है। अगर आप गरीब जनता की बात करेंगे तो आपको जनता की भाषा पर भी ध्यान देना होगा। हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं को समृद्ध बनाने की ज़रूरत है ।
November 14 at 5:10pm · Unlike · 3 people
Uday Prakash सुयश जी, आपके दिये हुए लिंक को देखने के बाद ही मैंने वह टिप्पणी लिखी थी। उसमें अगर देखें तो आप सहमत होंगे कि अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, हालैंड आदि ऐसे देश, जिनकी अर्थव्यवस्था पश्चिम में अपेक्षाकृत अधिक मज़बूत है और नयी अर्थनीति के तहत जिनके साथ रुपये का संपर्क और विनिमय अधिक हो रहा है, वहां यह 'लोगो' या 'चिह्न' अंक के पहले है। शायद इसी सुविधा के कारण रिज़र्व बैंक ने और इस चिह्न को चुनने वालों ने ऐसा निर्णय लिया होगा। यह सिर्फ़ मेरा अनुमान भर था। फ़्रांस, रूस और इटली आदि देशों में (वही लिंक आप देखें) में यह 'चिह्न' बाद में लिखा जाता है, इससे 'पहले' और 'बाद में' के दोनों प्रस्ताव स्थगित हो जाते हैं।
हिंदी के साथ हमेशा अंग्रेज़ी को खड़ा किया जाता रहा है। इससे हम सब परिचित हैं।
मुझे कुल मिलाकर इस बहस में ऐसा लग रहा है कि 'लोगो' (logo) या 'चिह्न' को भाषा, वह भी हिंदी और उसकी लिपि 'देव नागरी' के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है। इसीसे ऐसे विचार और अपएक्षाएं पैदा हो रही हैं। रुपये के इस 'लोगो' को सिर्फ़ एक किसी भाषा और एक किसी लिपि के साथ जोड़ना उपयुक्त नहीं होगा। हिंदी तो चलिये फिर भी पश्चिम की अन्य भाषाओं की तरह भारोपीय परिवार (Indo-European) की भाषा है, लेकिन हमारे देश में तो द्रविड़, आग्नेय, अर्ध-आग्नेय आदि अनेक भाषाएं हैं। मेरा सिर्फ़ यह कहना है कि हिंदी के 'र' की तरह झलकते इस 'चिह्न' को अपनी भाषा से जोड़कर देखने की बजाय उसे भारतीय मुद्रा चिह्न (INR sign) की तरह देखा जाय।
बाकी शब्दों को अपने अनुकूल ढालने और बदलने की बात से मैं सहमत हूं। सात साल पहले हुए एक भाषा सर्वे में सामने आया था कि सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार और भूमंडलीकरण के परिणामस्वरूप, हिंदी का जितना संपर्क अन्य भाषाओं के साथ बढ़ा है, उसके चलते लगभग ४०० शब्द हर रोज़ इसमें आते हैं। कुछ हमेशा के लिए इसमें बस जाते हैं, और कुछ बाहर हो जाते हैं। यह प्रकृया काफ़ी तेज़ और जटिल है। एक सर्वेक्षण यह भी बतलाता था कि आज के औसत, व्यावहारिक, बोलचाल की हिंदी (साहित्य और पाठ्य-पुस्तकों की हिंदी नहीं) में सामान्य तौर पर तीन से सात भाषाओं के शब्द होते हैं। कुछ वाक्य तो ऐसे भी हैं जिनमें ग्यारह भाषाओं के शब्द हैं।
यह जो भाषिक स्मन्वीकरण और प्रसंस्करण इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है, उसमें पहले की तरह 'अभिजन-नियंत्रण' और 'राजकीय' हस्तक्षेप बहुत प्रभावकारी नहीं रह गया है।
November 14 at 6:32pm · Unlike · 7 people
DrRaju Ranjan Prasad कुछ इनसे बड़े सवाल अभी तक अनुत्तरित हैं .
November 14 at 6:46pm · Unlike · 3 people
सुयश सुप्रभ Suyash Suprabh उदय जी, मुद्रा चिह्न का प्रयोग सभी भारतीय भाषाओं में होगा। अभी केवल हिंदी के संदर्भ में बात हो रही है। गंगा सहाय जी ने भी अपने संदेश में दो बार 'हिंदी में' शब्दों का प्रयोग किया है।

भाषा की अनेक प्रयुक्तियाँ होती हैं। अनौपचारिक भाषा किसी तरह के नियंत्रण से परे होती है। लेकिन जब भाषा को ज्ञान का साधन बनाया जाता है तब कुछ नियमों का पालन अनिवार्य हो जाता है। साहित्यिक भाषा और प्रयोजनमूलक भाषा में हमेशा अंतर होता है। प्रयोजनमूलक भाषा में कुछ नियम अनिवार्य हो जाते हैं। हिंदी को ज्ञान की भाषा बनाने के संदर्भ में लेखकों और बुद्धिजीवियों की उदासीनता मुझे कभी-कभी हैरान करती है।
November 14 at 7:12pm · Like
Mosam Rani AAP SAHI KAHTE HO BILKUL SAHI PAR SABHI LOG ISKO LIKH TO GALT TARIKE SE HI RAHE HAIN NA. KAYA KAR SKTE HAIN HUM ABB BATO..............................
November 14 at 9:51pm · Like
Raj Kishore आपसे पूरी तरह सहमत हूँ।
November 14 at 10:23pm · Like
Priyankar Paliwal हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह यूनीकोड कन्सिर्शियम से प्रमाणित अन्तरराष्ट्रीय प्रतीक चिह्न है . साहित्य में इसका प्रयोग रवानी/प्रवाह/भाषा के स्वभाव के हिसाब से चाहे जैसे करें पर वाणिज्य/अर्थशास्त्र/बैंकिंग आदि में इसका प्रयोग उस डोमेन की सुविधा और सुरक्षा के हिसाब से ही निर्धारित होगा.सामान्यतः प्रपत्रों/चैक आदि में प्रतीक चिह्न पहले मुद्रित करना अधिक सुविधाजनक होता है . भले ही यह गद्यांश के बीच में गतिअवरोधक की तरह अटपटा लगे.
November 14 at 10:49pm · Unlike · 3 people
प्रवीण त्रिवेदी Praveen Trivedi प्रतीक चिन्ह या तो पहले लगता या फिर बाद में !
फिर भी इसमें इतने प्रश्न समाहित ?
गुलामी की मानसिकता से लेकर साम्रज्यवाद तक !!
धन्य हुए हम!
November 15 at 12:25am · Like · 1 person
Priyankar Paliwal ‎* कन्सोर्टियम
November 15 at 5:27pm

प्रो. तुलसी राम की आत्‍मकथा 'मुर्दहिया' का एक अंश

प्रो. तुलसी राम की आत्‍मकथा 'मुर्दहिया' का एक अंश
by गंगा सहाय मीणा on Friday, November 26, 2010 at 2:02am

... इसी बीच बड़ी तेजी से गांवों में एक अफवाह उड़ गयी कि साधुओं के वेष में मुड़िकटवा बाबा, घूम घूम कर बच्चों का सिर काट कर ले जा रहे हैं। धोकरकसवा बाबा' तथा लकड़सुघवा बाबा' की भी अफवाह खूब फैली। कहा जाने लगा कि धोकरकसवा बाबा बच्चों को पकड़ कर अपनी धोकरी (यानि भिखमंगे जोगियों के कंधे पर लटकने वाला बोरीनुमा गहरा झोला) में कस कर बांध देते हैं जिससे वे मर जाते है। तथा लकड़सुघवा बाबा एक जादुई लकड़ी सुंघा कर बच्चों को बेहोश करके मार डालते हैं। हमारे गांव में अफवाह उड़ी कि ये तीनों प्रकार के बाबा लोग गांव के चारों तरफ विभिन्न सीवानों तथा मुर्दहिया के जंगल में छिपे रहते हैं और वे बच्चों को वहीं ले जाकर मारते हैं। मुर्दहिया में गांव के मुर्दे जलाये तथा दफनाये जाते थे। यहीं गांव का श्मशान था तथा गांव के आसपास पीपल के पेड़ों पर भूतों ने अपना अड्डा बना लिया है। ये घटनाएं भी नौ ग्रहों के मेल के कारण हो रही हैं, जिसके कारण एक भारी गदर होने वाला है। इन अफवाहों ने गांव के बच्चों से लेकर बूढ़ों तक की जान सुखा दी। लोग डर के मारे संध्या होते ही घरों झोपड़ियों में बंद हो जाते थे। उस समय दलितों के अधिकतर घरों में लकड़ी के दरवाजे या केवाड़ी नहीं होती थी। केवाड़ियों के नाम पर बांस के फट्ठों को कांटी ठोक कर एक पल्ले को केवाड़ीनुमा बना लिया जाता था, जिसे ÷चेंचर' कहा जाता था। इन चेंचरों को दरवाजों में फिट कर दिया जाता था तथा उन्हें बंद करने के लिए सिकड़ी की जगह रस्सी से काम लिया जाता था। अतः रस्सी से बंधे चेंचरों की आड़ में सो रहे दलित रात भर इस चिन्ता में पड़े रहते थे कि यदि मुड़िकटवा बाबा आ गये तो बड़ी आसानी से चेंचरों को तोड़ कर लोगों को मार डालेंगे। जहां तक इन बाबाओं के सीवानों तथा मुर्दहिया में छिपे रहने का सवाल है, हमारे गांव का भूगोल काफी रोचक है। उन दिनों यानि आज से ठीक पचास साल पूर्व हमारे गांव के पूर्व तथा उत्तर दिशा में पलाश के बहुत घने जंगल थे जिसमें, पीपल, बरगद, सिंघोर, चिलबिल, सीरिस, शीशम, अकोल्ह आदि अनेक किस्म के अन्य वृक्ष भी थे। गांव के पश्चिम तरफ करीब एक किलोमीटर लम्बा चौड़ा ताल था, जिसमें बारहों महीने पानी रहता था। इस ताल में बेर्रा, सेरुकी, पुरइन, तिन्ना तथा जलकुम्भी आदि जैसी अनेक जलजीवी बनस्पतियां पानी को ढंके रहती थीं। रोहू, मंगुर, गोंइजा, बाम, पढ़िना, टेंगरी, गिरई, चनगा, टेंगना, भुट्टी, चल्हवा, सिधरी, कवई आदि जैसी अनेक मछलियों की भी भरमार थी। इस ताल की सबसे ज्यादा छटा बिखरती थी उसमें पनडुब्बी काली मुर्गियां, बिगौंचौ तथा अनगिनत सफेद बगुलों जैसे पक्षियों के निवास से। इस ताल के किनारे ढेर सारे पेड़ थे जिसमें एक बड़ा पीपल का भी पेड़ था जिस पर लोगों के विश्वास के अनुसार ताल का खतरनाक भूत रहता था। दक्षिण तरफ खेत ही खेत थे। इस भूगोल में विभिन्न दिशाओं में स्थित खेती लायक जमीन को पूरे क्षेत्रा का सीवान कहते थे जिनके अलग अलग नाम थे। हमारे गांव के सीवान क्रमशः पूरब में मुर्दहिया, उत्तर में भर्यैया, सरदवा, टड़िया, पश्चिम में समण्डा, महदाई माई, परसा, तथा दक्षिण में गुदिया के नाम जाने जाते थे। इसी तरह क्रमशः टड़वा, भुजही, लक्खीपुर, भटगांवा अमठा, दौलताबाद, मठिया, पारूपुर, परसूपुर तथा चतुरपुरा नामक विभिन्न पड़ोसी गांव थे। दौलताबाद के बाद वाला पश्चिमी गांव विश्वविख्यात बौद्ध तथा कम्युनिस्ट विद्वान महापंडित राहुल सांकृत्यायन का गांव कनैला था। इन्ही सीवानों से घिरे हमारे धर्मपुर गांव के सबसे उत्तर में अहीर बहुल बस्ती थी जिसमें एक घर कुम्हार, एक घर नौनिया, एक घर गड़ेरिया तथा एक घर गोड़ (भड़भूजा) का था। बीच में बभ्हनौटी (ब्राह्मण टोला) तथा तमाम गांवों की परम्परा के अनुसार सबसे दक्षिण में हमारी दलित बस्ती। एक हिन्दू अंधविश्वास के अनुसार किसी गांव में दक्षिण दिशा से ही कोई आपदा, बीमारी या महामारी आती है, इसलिए हमेशा गांवों के दक्षिण में दलितों को बसाया जाता था। अतः मेरे जैसे सभी लोग हमारे गांव में इन्हीं महामारियों आपदाओं का प्रथम शिकार होने के लिए ही दक्षिण की दलित बस्ती में पैदा हुए थे। साथ ही गांव का भौतिक भूगोल उन तमाम भुतही खूनी अफवाहों के लिए प्राकृतिक रूप से बेहद अनुकूल था। मुर्दहिया, भर्थैया तथा ताल के पास वाली सीवान परसा तो इन भूतों की भूमिगत बस्तियां थीं ही। इन अफवाहों के बीच मुर्दहिया सबसे डरावनी बन गयी थी। गर्मी के दिनों में वहां हजारों बड़े बड़े पलाश के पेड़ एकदम सूर्ख लाल टेंसुओं (फूलों) से लद जाते थे। दूर से देखने पर लगता था कि जलती हुई लाल आग की रक्तीली लपटें हिलोरें ले रही हैं। उन्हें देख कर ऐसी भी अनुभूति होती थी कि मानों मुर्दहिया की बुझी हुई चिताएं पलाश के पेड़ों पर चढ़ कर फिर से प्रज्ज्वलित हो गयी हों। आम दिनों में भी गांव के लोगों का कहना था कि दोपहर के समय तो मुर्दहिया पर कदापि नहीं जाना चाहिए, क्योंकि भूत उस समय बहुत गुस्से में होते हैं और वे कटहवा कुत्तों के वेष में घूमते हैं। किसी के मिल जाने पर उसे नोंच नोंच कर खा जाते हैं। लाल टेंसुओं से लदे ये पलाश के पेड़ जहां एक तरफ अत्यंत मनमोहक लगते थे, वहीं उनके मुर्दहिया पर होने के कारण इन पेड़ों की लालिमा बेहद डरावनी छवि प्रस्तुत करती थी, विशेष रूप से चांदनी रात में वे खून में लथपथ किसी घायल व्यक्ति जैसे प्रतीत होते थे। इसी दौरान हमारे ग्रामीण क्षेत्राों में हैजे की महामारी आयी जिसका सबसे जबर्दस्त असर पूरब में मुर्दहिया से थोड़ी दूरी पर पड़ोसी गांव टड़वां में पड़ा। हमारी मुर्दहिया और टड़वां के बीच से होकर वह नाला बहता था जो प्राइमरी स्कूल से होकर आगे बढ़ते हुए लगभग पांच मील दूर स्थित मंगही नदी में मिल जाता था। इन गांवों में किसी दिन किसी एक के भी हैजे से मरने पर पचासों के मरने की अफवाह उड़ जाती थी, जिससे बड़ा चिन्ताजनक माहौल पैदा हो गया था। फिर भी बड़ी भारी संख्या में लोग मरे थे। हमारी मुर्दहिया के आसपास की जंगली जमीन मुर्दों से पट गयी थी, विशेष रूप से नाले के तीरे तीरे अनेकों कब्रें उग आयी थीं। एक प्रथा के अनुसार दलितों की कब्रों पर छोटी छोटी डंडियों में लाल कपड़े की झंडियां गाड़ दी जाती थीं। एक सिरे से देखने पर हवा के झोकों से फडफड़ाती ये झंडियां ऐसे लगती थीं कि मानों भूतों की लाल लाल फसलें तैयार होकर लहलहा रही हों। हैजे से मरे हुए लोगों की लाशों से लोग इतना डरे हुए थे कि बहुत छिछली सी कब्रें जल्दी जल्दी खोद कर उन्हें दफना देते थे। गन्ने तथा अन्य बड़ी फसलों में बड़ी संख्या में छिपे हुए सियारों ने वहां से निकल कर मुर्दहिया तथा उस नाले के आसपास अपना बसेरा बना लिया था। ये सियार छिछली कब्रों को खोद कर अक्सर लाशों को चिचोरते हुए नजर आते थे। रोज स्कूल जाते हुए ऐसा नजारा देखना हमें अत्यंत भयभीत कर देता था। उनके बारे में अफवाह फैली हुई थी कि मुर्दा खाने से ये सियार पागल हो जाते हैं इसलिए आदमी को दौड़ा कर वे काट कर खा जाते हैं। इस डर से कोई उन्हें भगाने नहीं जाता था और न कोई उन बचीखुची लाशों को फिर से दफनाने ही जाता। यह बड़ा ही हृदय विदारक दृश्य होता। जिनकी लाशों को सियारों के खूंखार जबड़ों से गुजरना पड़ता, पता चलने पर उनके सगे सम्बंधियों का, विशेष रूप से औरतों का वर्णनात्मक शैली में गा गाकर रोना दिल को दहला देता था। उधर रातों में मुर्दाखोर सियारों का हुवां हुवां वाला शोर बच्चों को बहुत डराता था, किन्तु मेरी दादी कहती कि मुर्दहिया के सारे पुराने भूत अपनी बढ़ती हुई आबादी से खुश होकर नाचते हुए सियारों जैसा गाना गाते हैं। दादी द्वारा प्रस्तुत भूतों की इस नृत्य विद्या तथा गायन शैली से मैं बहुत घबड़ा जाता था। दादी यह भी कहती थी कि महामारी में मरने वाली औरतें नागिन बन कर घूमती हैं। उनके काटने से कोई भी जिन्दा नहीं बचता। दादी मुझे अक्सर याद दिलाती कि किसी झाड़ी झंखार से गुजरते हुए ÷जै राम जमेदर' जरूर दोहराते जाना। ऐसा कहने से नाग नागिन भाग जाते हैं। मैं दादी की सारी बातों को इस धरती का अकाट्य अंतिम सत्य मानता था। इसलिए अक्षरशः उसका पालन करता था और जब भी किसी कंजास से गुजरता, मैं ÷जै राम जमेदर, जै राम जमेदर' रटता जाता, किन्तु इस मंत्रा की गुत्थी न दादी जानती थी और न गांव का कोई अन्य। दादी इस तरह की अनसुलझी गुत्थियों की ÷इनसायक्लोपीडिया' थी। अतः मेरे समझने का सवाल ही नहीं खड़ा होता था। जब मैंने काफी बड़ा होकर ÷महाभारत' पढ़ा तब जाकर यह गुत्थी सुलझ पायी, वह भी यह जानने पर कि पौराणिक वीर अर्जुन के पौत्रा राजा परीक्षित के बेटे का नाम जनमेजय था, जिन्होंने सांपों को मारने का एक सर्पयज्ञ' करा कर उन्हें हवनकुंड में जला दिया था। तभी से धरती के सारे सांप जनमेजय का नाम सुनते ही अपनी जान बचाने के लिए भाग जाते हैं। जनमेजय ने सांपों से क्रुद्ध होकर इस सर्पयज्ञ को इसलिए कराया था क्योंकि तक्षक नाग के काटने से उनके पिता परीक्षित की मृत्यु हो गयी थी। दादी इसी पौराणिक गाथा को सम्भवतः अपनी दादी से सुन कर जनमेजय का तद्भव अपनी भाषा में ÷जमेदर' कहती थी। दादी के इस मंत्रा की सच्चाई चाहे जो भी हो, मैं जब तक गांव में रहा, जै राम जमेदर' के दम पर ही भुतनी नागिनों को भगाता रहा।छुट्टी के दिन दलित बस्ती के अन्य बच्चों के साथ मैं भी गोरू यानि घर के पालतू जानवरों गाय, भैंस और बकरियों को चराने के लिए ले जाता था, या यूं कहिए कि चराने जाना पड़ता था। संयोगवश दूब वाली घास की चारागाहें मुर्दहिया के ही जंगली क्षेत्रा में थीं। इसलिए वहीं चराने की मजबूरी थी। गर्मियों के दिन में इन जानवरों को चराते समय कभी कभी एक अनहोनी हो जाती थी, वह थी सियारों द्वारा बकरियों का अचानक मुंह से गला दबा कर मार डालना। हम बच्चे जानवरों को चरने के लिए छोड़ छोटे छोटे पेड़ों पर चढ़ कर लखनी' अथवा ओल्हापाती' नामक खेल खेलने लगते थे। इस खेल में एक दो फीट पतली लकड़ी पेड़ के नीचे रख दी जाती, फिर एक लड़का पेड़ से कूद कर उस लकड़ी जिसे ÷लखनी' कहा जाता था, को उठा कर अपनी एक टांग ऊपर करके उसके नीचे से फेंक कर पेड़ पर पुनः चढ़ जाता था। जहां लखनी गिरती थी, पेड़ के नीचे खड़ा दूसरा लड़का उसे उठा कर दौड़ता हुआ पुनः पेड़ के नीचे आकर उसी लखनी से पहले वाले को जमीन से ऊपर कूद कर छूने की कोशिश करता वह भी सिर्फ एक बार में। यदि उसे छू लिया तो पेड़ चढ़े लड़के को मान लिया जाता कि वह अब ÷मर' चुका है, इसलिए वह खेल से बाहर हो जाता था। फिर लाखनी से छूने वाला लड़का विजेता हो जाता। इस ÷मरे' हुए लड़के को पेड़ के नीचे खड़ा होना पड़ता तथा विजेता पेड़ पर चढ़ जाता और खेल की वही प्रक्रिया पुनः दोहरायी जाती। परिणामस्वरूप कोई मरता और कोई विजेता बनता रहता। मुर्दहिया पर खेला जाने वाला यह खेल हम बच्चों के बीच अत्यंत मनोरंजक होता था, किन्तु इसी मनोरंजन के दौरान प्रायः सियारों का बकरियों पर हमला हो जाता था और बकरियों का गला उनके तेज जबड़ों में दबते ही वे मुश्किल से मात्रा एक बार जोर जोर से बें बें करके शांत हो जाती। उनकी ये बें बें सुन कर जब तक हम बच्चे अपनी लाठियां लेकर सियारों को दौड़ा कर भगाते, तब तक उन बकरियों की कथित ÷आत्मा' को वास्तविक शांति मिल चुकी होती। लखनी का हमारा यह खेल भुतही मुर्दहिया को फिर से मंचित कर देता। हम सभी बच्चे मरी बकरी को ठिठराते हुए बस्ती में डरते डरते आते। ऐसी बकरियों की मसालेदार दावतें तो लोग खूब उड़ाते, किन्तु बकरी चराने वाले बच्चे की पिटाई हर दावत के पहले एक आवश्यक कर्मकांड बन चुका था। एक बार हमारा एक बकरा इसी लखनी के खेल में सियारों का शिकार बन गया। यह बकरा मनौती वाला था, जिसकी बलि चमरिया माई को देनी थी। जब मैं उसी ठिठराते की प्रक्रिया से बकरे को लेकर घर पहुंचा तो वही पूर्वोक्त आवश्यक कर्मकांड शुरू हो गया। ऐसे कर्मकांडों के शास्वत पुरोहित वहीं मेरे अति गुस्सैल नग्गर चाचा हुआ करते थे। मेरी तत्काल जो धुनाई हुई, वह तो हुई ही, किन्तु कई दिनों तक समय समय पर चेचक की शिकार मेरी ज्योति विहीन दायीं आंख उनके रौद्र संचालित जबान का असली निशाना बनी रही। बार बार दोहराई जाने वाली वह पुरानी कनवा कनवा' की बौछार उन सियारों के जबड़ों से कई गुना ज्यादा तेजी से मेरे मस्तिष्क को बेंधती थी। चूंकि वह चमरिया माई को बलि चढ़ाने वाला मनौती का बकरा था, इसलिए किसी अनहोनी का मानसिक भय काफी दिनों तक मुझे सताता रहा। दादी ने अगियारी करनी शुरू कर दी। उसने चमरिया माई का बार बार जाप करते हुए एक दूसरे बकरे के साथ छौना, यानि सूअर के बच्चे की भी बलि चढ़ाने की मनौती की, साथ ही मुझे माफ कर देने की भी विनती की। दादी कहती थी कि चमरिया माई को छौना बहुत पसंद है, इसलिए उसकी बलि पहले दी जाएगी। कुछ दिनों के बाद लगभग चार किलो का एक छौना खरीदा गया। दादी ने कहा कि इसकी बलि मेरे ही हाथों दी जाएगी, तभी चमरिया माई मुझे माफ करेंगी। मैं बहुत घबड़ाया हुआ था। इसलिए बलि देने में मुझे जरा भी हिचक नहीं हुई। उस छौने को हम चमरिया माई के उसी कटीली झाड़ी वाले टीले पर ले गये। इस टीले को ÷कोटिया माई' थान भी कहा जाता था। मेरे एक चचेरे भाई चौधरी चाचा के सबसे छोटे बेटे सोबरन मेरे साथ लाठी लेकर गये। वे छौना को लिटा कर लाठी को उसके पेट के बीचोंबीच रख कर ताकत के साथ उसे दबा रखा ताकि वह उछले नहीं। लाठी से दबाते समय छौना जोर जोर से चोकरने लगा। मैं बिल्कुल डर गया, किन्तु दादी की हिदायत के अनुसार मैंने हिम्मत जुटा कर साथ ले गये एक छोटे से गड़ासे को फिर से पत्थर पर घिस कर उसकी धार को और तेज किया और एक बार जोर से बोला :बोला बोला चमरिया माई की जै।'' मेरे साथ यह नारा सोबरन भैया ने भी दोहराया, फिर मैंने गड़ासे को छौने की नटई की तरफ खड़ा करके आंखें मूद कर अधाधुंध रेतने लगा। छौने का चोकरना कई बार तेज होकर शीघ्र ही शांत हो गया और उसकी गर्दन बिल्कुल अलग। मैंने दादी के कहने के ही अनुसार बहते हुए खून को हाथ में रोप कर चमरिया माई के थान पर रखे हुए मिट्टी के हाथी घोड़ों के ऊपर छिड़क दिया और सियार द्वारा बलि के बकरे को मार डालने के अपने गुनाह के लिए उनकी विनती की। इसके बाद हम बलि चढ़ाये छौने को लेकर घर वापस आ गये। हमारे घर के सभी लोग सूअर का मांस खाते थे, किन्तु एक परम्परा के अनुसार जहां रोज का खाना मिट्टी से बने चूल्हे पर लकड़ी जला कर पकाया जाता, वहां इसे कभी नहीं पकाया जाता, जबकि मुर्गा, मछली तथा बकरे का मांस वहां पकता था। सूअर का मांस हमेशा घर के बाहर खुले मैदान में ईंट का चूल्हा बना कर बड़े हंडे में पकाया जाता था। सूअर का मांस हमेशा मुन्नर चाचा पकाते और सबको वे ही बांटते भी थे। उस दिन जब मेरे द्वारा बलि वाला छौना पकाया जा रहा था, तो मुन्नर चाचा ने मुझे एक छोटा सा बांस का सोटा पकड़ा कर कहा कि बटुले (हंडा) की तरफ ध्यान से देखते रहना, वरना सूअर का बच्चा निकल कर भाग जाएगा। मैं छौने के भाग जाने की उस कल्पित सम्भावना से चिन्ताग्रस्त होकर बड़ी मुस्तैदी से वहां खड़ा रहता। मुझे बार बार यह संदेह होता कि जिस छौने को मैंने ही काटा है, वह पकते समय बटुले से निकल कर कैसे भाग सकता है, किन्तु घर के उस घोर अंधविश्वासी वातावरण में मैं इस कोरी कल्पना को भी अकाट्य सत्य समझने पर मजबूर था। मुझे यह मनोवैज्ञानिक भय भी सताता रहता कि यदि छौना बटुले से भाग गया, तो गुसौल गगार चाचा का मुकाबला कैसे करूंगा? मुझे बाद में समझ में आया कि मुन्नर चाचा का वह एक निर्दोष मजाक था। बाद में बस्ती के अन्य लोगों में यह मजाक फैल गया और लोग इस घटना को दोहरा दोहरा कर खूब मजा लेने लगे। किन्तु जब तक मैं इस मजाक में निहित मनोरंजन की सच्चाई को समझूं, उसके पहले लाठी लेकर सूअर पकते बटुले की कई बार रखवाली कर चुका था। मेरी दादी भी खूब हंसती और कहतीः त मुरूख हउवे रे।'' इस तरह की एक विचित्रा मूर्खता का शिकार मैं लगभग उसके कुछ ही दिन बाद कक्षा तीन में पढ़ते हुए स्कूल में बन गया था। मेरी कक्षा के सहपाठी मुल्कू ने एक दिन अपने गांव हनौता से बड़े बड़े बेर के फल लाये थे। उन्होंने कुछ बेर मुझे भी दिया। एक बेर खाते खाते उसका बीज भी अचानक घोंट लिया। साथ ही बेर खा रहे मुल्कू ने जब बेर का बीज घोटते हुए देखा, तो तुरंत उन्होंने अन्य बच्चों से कहना शुरू कर दिया कि इसने (मैंने) बेर का बीया (गुठली) घोंट लीया है और अब इसके पेट को फाड़ कर बेर का पेड़ निकलेगा। इतना सुनते ही अन्य बच्चे भी इस ÷सत्य' को दोहराने लगे। डर के मारे मैं बेहाल हो गया। कई दिनों तक पेट से पेड़ निकलने की आशंका से ग्रस्त होकर ठीक से सो नहीं सका। डर के मारे घर में भी किसी से कुछ न बताया। चुपके से चमरिया माई को धार और पुजौरा चढ़ाने की मनौती माना और विनती की कि हे चेमरिया माई उस सम्भावित पेड़ को पेट में नष्ट कर दे। कई दिनों बाद कक्षा के मेरे सबसे गहरे साथी संकठा सिंह जिन्होंने मुझे अक्षर लिखना सिखाया था, के समझाने पर मैं समझ पाया कि पेट में किसी भी बीज से पेड़ नहीं निकलता। मैंने बाद में चमरिया माई को मनौती वाला धार पुजौरा उसी स्थान पर जाकर चढ़ाया। इस घटना के बाद कई वर्षों तक मैं मनोवैज्ञानिक भय के कारण बेर खाने से घबड़ाता रहा। सूअर पकते बटुले की रखवाली तथा पेट से बेर के पेड़ के उगने की सम्भावना वाली मूर्खताओं को याद करके मैं आज भी एक विचित्रा ढंग से स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूं।सन्‌ 1957 का वर्ष मेरे साथ साथ गांव की सारी बस्ती के लिए बहुत घटनाप्रधान था। मुर्दहिया के पास वाली सीवान भर्थैया के घने जंगल में हमारे गांव के एक अहीर पौहारी बाबा (पावहारी बाबा) एक झोपड़ी बना कर रहते थे। उनकी झोपड़ी से आधा किलोमीटर दूर एक पेड़ के नीचे मचान बना कर पड़ोसी गांव टड़वा के एक ÷फक्कड़ बाबा' रहते थे। फक्कड़ बाबा लगभग नंग धडं+ग रहते थे। वे सिर्फ एक डेढ़ फीट लम्बी पतली सी कपड़े की चीर आगे पीछे अपनी करधनी में लपेटे रहते थे। पूरी देह में वे कंडे की राख हमेशा पोते रहते थे। जाड़े के दिनों में भी वे बिना कुछ ओढ़े सोते थे तथा किसी से कभी कुछ नहीं बोलते। वे पूर्णरूपेण मौनव्रती थे। उनके बारे में तरह तरह की किंवदंतियां फैली हुई थीं। कोई कहता कि वे भूतपूजक हैं, तो कोई उन्हें साक्षात जिन्दा भूत समझता। उनके मचान के आसपास कोई कभी नहीं जाता, खास करके जंगल में घास काटने वाली औरतें उनसे बहुत डरती थीं, क्योंकि उनके बारे में यह भी प्रचलित था कि वे औरतों को सम्मोहित करके देह शोषण करते हैं। वे कभी कभी घूमते हुए हमारे गांव भी आते थे और लोग उन्हें पैसा और सिद्धा (आटा, दाल आदि) देते। वे बिना कुछ बोले उसे लेकर वापस चले जाते। वे प्रतिदिन मिट्टी की हड़िया में कंडे की आग पर दिन में सिर्फ एक बार खाना पका कर खाते। इन तमाम विचित्राताओं के बीच एक दिन फक्कड़ बाबा को घसियारों ने मचान के बाहर मरा पड़ा देखा। शीघ्र ही उनके मरने की खबर क्षेत्रा के अनेक गांवों में फैल गयी। धीरे धीरे उनके मचान के पास गांव का गांव उमड़ पड़ा, हजारों की भीड़ लग गयी। क्योंकि फक्कड़ बाबा इन तमाम विवादमय अफवाहों के बीच चहुंदिश चर्चा में हमेशा बने रहते थे। मेरे पिता जी भी उनकी लाश को देखने गये थे। लौट कर उन्होंने बताया कि कुछ आदमी रात में उन्हें ÷घाठा लउर' देकर मार डाले थे, शायद पैसों के लालच में। ÷घाठा लउर' के बारे में पिता जी ने परिभाषित करते हुए बताया कि दो लाठियों के बीच आदमी की नटई दबा कर उसका दम घोट दिया जाता है। इसी को घाठा लउर कहा जाता है जिससे बहुत घुट घुट कर तकलीफ के बाद कोई आदमी मरता है और आवाज नहीं निकलती। पिता जी ने यह भी बताया कि ÷घाठा लउर' से मारे जाने की पहचान मृतक के गले में नीला निशान बन जाने तथा जीभ के मुंह से बाहर निकल जाने से होती है, जैसा कि फक्कड़ बाबा के साथ हुआ था। फक्कड़ बाबा की हत्या से हमारे गांव में बड़ी दहशत फैल गयी। अफवाह उड़ गयी कि इलाके के सारे भूत आयेंगे और इकट्ठा होकर लोगों से चुन चुन कर फक्कड़ बाबा की हत्या का बदला लेंगे। भूतों का भय इतना फैल गया कि लोगों का भर्थैया की तरफ जाना बंद हो गया। हमारे गांव के कई दलित भूतों की पूजा करते थे और उनमें से हर एक के भूत बाबा अलग अलग पीपल के पेडा पर रहते थे। हमारे घर के भूतबाबा वहीं पड़ोसी गांव दौलताबाद के पास वाले पुराने पीपल के पेड़ पर रहते थे। उस भूतबाबा को खुश करने के लिए फक्कड़ बाबा की हत्या के बाद पहली बार मुन्नर चाचा मुझे अपने साथ ले गये। हम लोग साथ में एक हड़िया दूध, एक सेर चावल तथा कुछ भेली और गाय बैल के गोबर से बने हुए सूखे गोइठे को भी ले गये थे। गोइठे का अहरा लगा कर हड़िया के दूध में चावल और भेली डाल कर ÷जाउर' (खीर) पकायी गयी, जिसमें से थोड़ा उस भूतबाबा वाले पीपल के पेड़ की जड़ पर चढ़ाया गया तथा एक लंगोट उसकी एक डाली में उस पर चढ़ कर मैंने बांध दिया। शेष जाउर को घर लाया गया जिसे परिवार के सभी लोग प्रसाद के रूप में खाये। इस चढ़ावे के बाद दादी का कहना था कि अब फक्कड़ बाबा की हत्या का बदला लेने वाले किसी अन्य भूत को हमारे खानदानी भूतबाबा हमारे परिवार के आसपास नहीं फटकने देंगे। दादी की इस बात से घर के सारे लोग पूर्णरूपेण आश्वस्त हो गये थे। बाद में ऐसी पूजाओं के लिए मुझे अकेला भेजा जाने लगा था। इस तरह की पूजाओं में भाग लेने के कारण मेरे अंदर एक अलग ढंग का विश्वास जगने लगा जिसके कारण धीरे धीरे मेरे मस्तिष्क से भूतों का डर दूर होने लगा। क्योंकि मुझे पूरा विश्वास होने लगा कि जब मैं स्वयं भूतबाबा को जाउर तथा लंगोट चढ़ाने जाता हूं, तो फिर उनसे डर कैसा? इसी बीच वर्षा के दिनों में मेरे सिद्धहस्त ÷मछरमरवा' पिता जी ने गांव के ताल के अंदर एक अखन्हा बांधा। पानी के अंदर गीली मिट्टी से गोल दीवार उठा कर पानी की सतह तक लाकर उसके ऊपर का हिस्सा हाथ से लीप कर चिकना बना दिया जाता है तथा गोल गड्ढे से छोटी हड़िया से पानी निकाल कर खाली कर दिया जाता है। इसी को अखन्हा बांधना कहते हैं। इस तरह के अखन्हा में मछलियां वहां से गुजरते हुए उसमें कूदने लगती हैं। पिता जी एक दिन रात में ऐसे ही एक ताल के एक अखन्हा से गगरी भर कर मंगुर तथा गिरई लेकर आ रहे थे। ताल के पास ही परसा नाम की सीवन में स्थित उस भुतहे पीपल के पास ही कुछ आम के पेड़ थे। रास्ता इन्हीं पेड़ों से होकर हमारे घर की तरफ आता था। पेड़ के पास पहुंचते ही पिता जी गगरी भरी मछलियां पटक कर हांफते हुए भाग कर घर पहुंचे। उनकी हालत बहुत खराब थी। पूछने पर घरवालों को उन्होंने डरते हुए बताया कि परसा का भूत आम के पेड़ों पर एक एक पत्ती पर दीया जलाये हुए था। इसलिए किसी अनहोनी से डर कर मैं गगरी वहीं पटक भाग आया। लोग बड़ी आसानी से विश्वास कर लिए। मैं भी उस रात बहुत डरा हुआ था। किन्तु यह तथ्य मेरे दिमाग में एक संदेह अवश्य पैदा किये हुए था कि इतने अधिक चिराग पेड़ पर कैसे जलेंगे? ठीक दूसरे दिन दलित बस्ती के आसपास के पेड़ों पर रात में देखा कि हजारों जुगनू जलते बुझते, चमकते हुए साफ नजर आ रहे थे। मैंने दादी को बताया कि लगता है, इन्हीं जुगुनुओं को पिता जी ने परसा के भूत का दीया जलाना समझ लिया था। दादी ने मेरा हवाला देकर यह बात घर में सबको बातायी। यह बात सुन कर नग्गर चाचा अपने पुराने ढर्रे वाली शाबाशी देते हुए बोल पड़े : कनवा एकदम सही कहत हव।'' शायद यह मेरे जीवन की पहली बुद्धिवादी तर्कणा थी।हमारे गांव की बभनौटी के पूरब दो पोखरे थे जिनमें से एक पुराना पोखरा दलित बस्ती के उत्तर में बहुत पास ही उसी चमरिया माई के स्थान के पास था। इस पोखरे के चारों तरफ भीटे के ऊपर बहुत पुराने बड़े इमली, पीपल और चिलबिल के पेड़ थे, जिन पर अनेक किस्म के पक्षियों के खोते थे। एक इमली के पुराने पेड़ पर मात्रा एक जोड़ा उल्लुओं का था, किन्तु चमगादड़ों का बहुत बड़ा जमघट था। थोड़ी दूर पर दलित बस्ती के पास एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था जो धीरे धीरे ठूंठा होता जा रहा था। इस ठूंठे बरगद पर सैकड़ों गिद्धों का बसेरा था। रात में अचानक मादा गिद्धों की चोकराहट से सारा वातावरण बड़ी कर्कशता के साथ जागृत हो जाता था। गांव के लोग कहते गिद्धों का प्रेमालाप चल रहा है। कई अवसरों पर गांव के अल्पवयस्क ब्याहता युवक आपस में बतियाते हुए सुनाई देते कि अमुक रात को गिद्धों से पे्ररित होकर वे ठीक से नहीं सो सके। किन्तु उस पुराने पोखरे के पेड़ों पर कभी कभी देर रात को किसी कारणवश दूसरे पक्षी भी चें चें कर उठते, विशेष रूप से जब उल्लुओं का वह जोड़ा कुडुक कुडुक करके जोर से चहकता तो उनकी एकदम अलग आवाज बड़ी दूर तक सुनाई पड़ती। उस आवाज को पूरा गांव अपशकुन मानता था। मेरी दादी की तरह अनेक औरतें यह कहतीं कि भूतों की पोखरे पर जब पंचायत होती हैं, तो उल्लू कुडुकते हुए शंख बजाते हैं जिससे पता चलता है कि ब्राह्मण भूतों की पंचायत हो रही है। हमारे गांव के पेड़ों पर एक चिड़िया महोखा जैसी लगती थी, वह खो खो करते हुए बोलती थी जिसे औरतें मरखउकी कहती थीं। यह मरखउकी भी बड़े अपशकुन की प्रतीक थी। इस मामले में गांव के कौए पार्ट टाइम अपशकुन थे। जब कभी कोई उड़ता हुआ कौआ किसी को पैरों या चोच से मार देता था, तो इसे भी अपशकुन माना जाता। यह अपशकुन इतना खतरनाक माना जाता था कि तुरंत घर के किसी व्यक्ति को सबसे नजदीकी रिश्तेदार के घर भेज कर यह संदेश दिया जाता कि अमुक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी। मृत्यु की खबर सुन कर रिश्तेदार औरतों का तत्काल रोना शुरू हो जाता, लेकिन शीघ्र ही उन्हें बता दिया जाता कि मृत्यु नहीं, बल्कि कौए ने चोच मारी है। इस विधि से कौए का अपशकुन दूर किया जाता था। किन्तु ये कौए स्थाई अपशकुन नहीं होते थे, बल्कि जब वे किसी के घर या झोपड़ी की बडे+र पर चढ़ कर कांव कांव करते, तो घर की औरतें खुश होकर कौओं को दाने खिलातीं, क्योंकि उनको विश्वास था कि बड़ेर पर कांव कांव में किसी नजदीकी रिश्तेदार के घर आने की सूचना होती थी। वैसे सच्चाई तो यह थी कि हमारे गांव में निर्वंश जंगू पांड़े, विधवा पंडिताइन, पोखरे वाला उल्लू, खो खो करने वाली मरखउकी चिड़िया और मैं स्वयं, हम पांचों असली अपशकुन थे जिन्हें देख सुन कर लोगों की रूह कांप जाती थी। उधर मुर्दहिया के पलाश के टेंसू जब मुरझा कर जमीन पर गिरने लगते तो उनकी जगह सेम की चिपटी फलियों की जैसी पलाश की भी छः सात इंच लम्बी चिपटी फलियां जिन्हें दादी टेंसुल कहती थी, निकलने लगतीं। कुछ दिन बाद ये टेंसुल सूख कर गिर जाती थीं। मेरी दादी इन टेंसुलों को मुझसे घर पर लाने के लिए कहती। वह टेसुलों को फाड +कर उसी तांबे के बड़े सिक्कों डब्बल की तरह दिखाई देने वाले बीजों को निकाल कर एक बड़ी सींग में रखती। जब किसी बच्चे के पेट में केचुआ या अन्य कीडे+ पैदा हो जाते तो दादी सींग से पलाश के कुछ बीज निकाल कर देती और सिल लोढ़े से थोडे+ पानी के साथ उसका रख यानि घोल बना कर पिलाने को कहती जिससे सभी कीड़े मर कर बाहर निकल जाते थे। पलाश के बीज पेट के कीड़ों को मारने की एक अचूक दवा थे। दादी घर में बड़ी पुरानी पुरानी बैलों की बड़ी बड़ी सींगें रखे हुई थी। इन सींगों में वह हींग समेत अनेक प्रकार की खरबिरिया दवाएं रखती थी। एक सींग में वह साही नामक जानवर की सूखी हुई अतड़ियां पोटिया भी रखती थी। हमारे गांव की मुर्दहिया के जंगल में साही पायी जाती थी। कभी कभी गांव के युवक मिल जुल कर साही को ढूंढ कर दौड़ा दौड़ा कर लाठियों से मार डालते थे। साही का मीट बहुत स्वादिष्ट होता था। मैंने भी कई बार साही का मीट खाया था। जब भी साही मारी जाती, दादी उसकी अतड़ियों पोटियों को खूब साफ करवा कर पानी में धुलवा लेती और सूखने के बाद ये अतड़िया सूखी लकड़ी की तरह चटाचट टूट जातीं। दादी इन्हें सींग में भर कर रख लेती। जब किसी का पेट दर्द करता, थोड़ी सी अतड़ी पोटी तोड़ कर उसे सिल पर दो चम्मच पानी डाल कर वही रख बना कर सुतुही से पिला देती। पेट दर्द तुरंत बंद हो जाता। दालचीनी तथा बांस का सीका पीस कर ललाट पर लगाने से सिरदर्द बंद हो जाता था। दादी इस तरह एक बैद्य भी थी। वह पैसों की रेजगारी को भी सींग में रखती थी। दलित बस्ती की कुछ अन्य बुढ़िया औरतें भी इस तरह के काम के लिए सींग का इस्तेमाल करती थीं। जाहिर है मरे पशुओं का डांगर खाने वाले दिनों में दादी बड़ी बड़ी सींगों को भी मुर्दहिया से काट लाती थी। वर्षों बाद जब मैंने बौद्ध त्रिापिटक पढ़ा तो उससे पता चला कि गौतम बुद्ध के महापरिनिवार्ण के ठीक सौ साल बाद करीब चौबीस सौ वर्ष पूर्व वैशाली में विद्वान भिक्षुओं की द्वितीय महासंगीत यानि बुद्ध के उपदेशों का संगायन हुआ तो उसमें दस संशोधन किये गये थे, जिनमें पहला ही संशोधन था ÷सिडि.लोण काप्प' यानि भिक्षा के समय जानवर की एक खाली सींग में नमक भर कर ले जाना। विनय पिटक में किसी बौद्ध भिक्षु के लिए किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री या धनसंचय की मनाही है, किन्तु इस संशोधन से मौलिक बौद्ध नियमों का उल्लंघन हुआ। इसका मूल कारण यह था कि भिक्षा में अकसर नमक नहीं मिलता था, इसलिए भिक्षु लोग बिना नमक का ही खाना पका कर खाते थे। इस व्यावहारिक कठिनाई से बचने के लिए यह संशोघन किया गया था, ताकि नमक मांग या खरीद कर सींग में रखा जा सके। तभी से सींग में संचय की यह बौद्ध प्रथा जारी हुई। दादी द्वारा दवाएं तथा पैसा, यहां तक कि सूई डोरा भी रखना सिद्ध करता है कि हमारे खानदान वाले सदियों पूर्व कभी खांटी बौद्ध अवश्य रहे होंगे। दादी की वे सींगें इसका प्रमाणहै।मुर्दहिया के संदर्भ में सन्‌ 1957 का ÷भादों' का महीना मेरे जीवन का एक विशेष यादगार वाला महीना है। उस समय हिन्दू धर्म के अनुसार ÷खरवांस' यानि बहुत अपशकुन वाला महीना था। इस बीच मेरे पिता जी जिस सुदेस्सर नामक ब्राह्मण की हरवाही करते थे, उनकी बुढ़िया मां मर गयी। उनके ही पट्टीदार अमिका पांड़े ने ÷पतरा' देख कर बताया कि अभी पंद्रह दिन खरवांस है, इसलिए मृत मां का दाह संस्कार नहीं हो सकता। यदि ऐसा किया गया तो माता जी नर्क भोगेंगी। उन्होंने सुझाव दिया कि माता जी की लाश को मुर्दहिया में एक जगह कब्र खोद कर गाड़ दिया जाय, तथा पंद्रह दिन बाद निकाल कर लाश को जला कर दाह संस्कार हिन्दू रीति से किया जाय। मेरे पिता जी मुझे लेकर मुर्दहिया पर कब्र खोदने गये। वे फावड़े से कब्र खोदते रहे और मैं मिट्टी हटाता रहा। जब कब्र तैयार हो गयी तो सुदेस्सर पांड़े अपने पट्टीदारों के साथ लाश को लाकर उस कब्र में डाल दिये। तुरंत उसको मिट्टी से पाट दिया गया। दफनाने से पहले टोटकावश सुदेस्सर पांडे ने कफन के एक कोने में सोने की मुनरी गठिया दी थी। एक अंधविश्वास के अनुसार किसी लाश के कफन में सोना बांधने से वह जल्दी नहीं सड़ेगी। ऐसा ही ब्राह्मणों के सुझाव पर किया था। पिता जी ने कुछ कटीली अकोल्ह की झाड़ियां काट कर कब्र के उपर डाल दी थीं, ताकि लाश को सियारों से बचाया जा सके। ऐसा करके सभी अपने घर लौट आये। सुदेस्सर पांड़े रोज मेरे पिता जी को मुर्दहिया पर भेजते कि वे कब्र को देख आवें, क्योंकि सियारों द्वारा खोद कर लाश को खा जाने की आशंका हमेशा बनी रहती थी. पिता जी काम में व्यस्तता के कारण दो चार दिन बाद स्वयं न जाकर मुझे कब्र देखने के लिए शाम के समय स्कूल से लौटते हुए मुर्दहिया पर जाने की हिदायत देते रहे। मैं वैसा ही करता था किन्तु कब्र के नजदीक नहीं जाता। थोड़ा दूर से ही देख लेता। वैसे स्कूल का रास्ता भी मुर्दहिया के पास से ही गुजरता था। इस तरह पंद्रह दिन जैसेतैसे बीत गये और पिता जी के साथ मेरी भी कब्र की रखवाली की अवधि समाप्त हो गयी साथ ही खरवांस भी गुजर गया। अब बारी थी पांड़े की माता जी को कब्र से बाहर निकाल कर उनकी लाश को जलाने की। मेरे पिता जी उन पंद्रह दिनों के दौरान प्रायः यह कहते थे कि कहीं कोई चोर डाकू उस सोने की मुनरी के लालच में कब्र खोद कर लाश को बाहर न कर दे। यदि ऐसा हुआ तो बड़ा अनर्थ होगा। सुदेस्सर पांड़े की हरवाही से पिता जी का इतना लगाव था कि वे उनकी माता जी की लाश को लेकर पांड़े से कहीं ज्यादा चिन्तित रहते थे। आखिर लाश निकालने का समय अमिका पांड़े के उस दैवी पतरा के अनुसार निर्धारित किया गया। सुदेस्सर पांड़े दो चार फावड़ा मिट्टी हटा कर दूर खड़े हो गये। सड़ांध आने के डर से उनके पट्टीदार भी दूर भाग गये। पिता जी कब्र की मिट्टी फावड़े से हटाते रहे। किनारे लायी गयी भुरभुरी मिट्टी फिर से कब्र में न गिरने पावे इसके लिए पिता जी मुझे मिट्टी पीछे ठेलने के लिए कहते रहे। मैं वैसा ही करता रहा। अंततोगत्वा कब्र में कफन वाला सफेद कपड़ा दिखाई देने लगा। यकायक उस सड़ी लाश की दुर्गन्ध से सारा वातावरण डगमगा गया। सुदेस्सर पांड़े भी मुंह पर गमछा बांधे दूर भाग गये, और वहीं से पिता जी से कहते रहे कि वे सोने वाली मुनरी को पहले ढूंढ कर कफन से निकाल लें। यह एक अजीब स्थिति थी। उस दिन मेरे मन में पहली बार यह बात समझ में आयी थी कि किसी के लिए मां की लाश की अपेक्षा सोना कितना प्रिय था। पिता जी ने मुझे भी गमछा मुंह पर बांध लेने को कहा। मैंने वैसा ही कर लिया। उस समय सारे ब्राह्मण वहां से चम्पत हो गये। सुदेस्सर पांड़े भी दूर ही खड़े रहे। पिता जी ने जैसे तैसे सड़ी लाश को पैर की तरफ से उठा कर मेरे हाथों में पकड़ा दिया और स्वयं सिर की तरफ से पकड़ लिया। आपार दुर्गन्ध और घृणा से मजबूर हम दोनों ने उस लाश को बाहर निकाल कर पहले से ही पास में सजायी चिता पर रख दिया। कफन से छुड़ा कर उस सोने की मुनरी को धूल से रगड़ कर पिता जी ने सुदेस्सर पांड़े के हवाले कर दिया। वे बड़ी मुश्किल से मुंह नाक बांध लाश के पास आये और आग जला कर चिता को जला दिये। पांड़े पुनः भाग कर दूर चले गये। वहां सिर्फ मैं और पिता जी खड़े रहे और लाश को जलाते रहे। इस बीच आग कम होती देख कर पिता जी ने पलाश की डालियां तोड़ कर चिता में डाल दीं। उधर सूरज डूबने वाला था। धीरे धीरे अंधेरा फैल रहा था। बड़ा डर लगने लगा जैसे तैसे लाश जलायी गयी और हम घर फावड़ा लेकर वापस आ गये। हमारे घर के पीछे एक छोटी सी पोखरी थी। हम उसमें जाकर खूब नहाये। पिता जी ने नहाने के बाद उसी अपने द्वारा लगाये गये पीपल के पेड़ की जड़ के पास घी का दीया जला कर पूजा की। पूजा की विधि उनकी वही चिर परिचित रो रो कर किसी से बाते करने वाली जैसी उस दिन भी रही। मुर्दहिया न जाने कितने वर्षों से अनगितन लोगों के दुख दर्द को जला कर राख करती आ रही थी। और न जाने कितने लोगों के दुख को अपनी धरती में दफना लिया था। और आगे भी इन दुखों को जलाती दफनाती रहेगी। उस दिन मुझे भी बड़ी गहराई से अनुभूति हुई थी कि मेरे भी अंदर एक मुर्दहिया जन्म ले चुकी थी, जिसमें भविष्य के न जाने कितने ही दुख दर्द जलने और दफ्न होने वाले थे। जब मैं पंद्रह वर्ष की अवस्था में हाई स्कूल पास करने के बाद पढ़ाई छूट जाने के कारण घर से 1964 में भागा तो उसी मुर्दहिया से होकर अंतिम बार गुजरा था। वैसे तो मैं अकेला ही था, किन्तु हकीकत तो यही थी कि चल पड़ी थी मेरे साथ मुर्दहिया भी। जब मुझे यह मालूम हुआ कि दुनिया में दुख है, दुख का कारण है और उसका निवारण भी, तो ऐसा लगा कि इस सत्य को ढूंढने से पहले तथागत गौतम बुद्ध कभी न कभी मेरी मुर्दहिया से अवश्य गुजरे होंगे।

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Vikas Mogha भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरूतियों का चिठ्ठा खोलता प्रो. तुलसी राम की आत्‍मकथा 'मुर्दहिया' का यह अंश अत्यधिक आकर्षक हैं ! निसंदेह उनकी पुस्तक भी अत्यधिक आकर्षक होगी ! मेरी असंख्य शुभकामनाएं प्रो. तुलसी राम की आत्‍मकथा 'मुर्दहिया' के लिए !
आपका सादर धन्यवाद् !!!
16 hours ago · Like · 3 people
Anil Tiwari Aye dil kinare ko kinara na samajh,
Aye dil sahare ko sahara na samajh,
Barish aane par kinare toot jate hain,
Musibat aane par sahare chooth jate hain… GM
10 hours ago · Like
Uday Prakash विलक्षण स्मृतिसंपन्न गद्य...। इतने विवरणों से भरा-पूरा, अपने में बांध लेने वाला ऐसा संस्मरण एक सचमुच विरल अनुभव है। तुलसीराम जी के साथ बिताये गये दिन बहुत याद आये। हास्टल का उनका कमरा और उनका पकाया गोश्त आज तक स्मृति में है। उन्होंने हिंदी गद्य का जो 'अखन्हा' यहां बांधा है, उसमें हिंदी भाषा के छोटे-मोटे चिनगे-कतले-मांगुर कूद-कूद कर मरेंगे!
वाह..! इसे शेयर करने के लिए आभार!
8 hours ago · Like · 3 people
Rajeev Kumar beech beech kahi kahi me mujhe apne gaon ka seen yaad jata bilkul usi tarah ke and-vishwash wahi dhakosalebazi bahut sahi likha. mai to ek baar me pad gaya. Meena Ji aap ka saadar dhanyabad tag karne ke lie.!!!!!!
4 hours ago · Like
Chandra Prabha mai bhi ese padh ke kuch aisa hi ehsas kr rahi thi ki mai aapne gaav aa gai hu..aisi kai rudhiya humare yhan bhi hai..nisandeh ye pustak behtareen hoge..meri dher sari shubhkamnaye unke liye:)
2 hours ago · Like · 1 person

फेसबुक के कारण ब्लॉगिंग में गिरावट आई है । सृजनात्मक अभिव्यक्ति घटी है,चिट्ठों के पाठक भी। क्या किया जाए?

Aflatoon Afloo फेसबुक के कारण ब्लॉगिंग में गिरावट आई है । सृजनात्मक अभिव्यक्ति घटी है,चिट्ठों के पाठक भी। क्या किया जाए?



Vishnu Bairagi यह चिन्‍ताजनक है। लगता है, 'फटाफट संस्‍कृति' यहॉं भी असर दिखाने लगी है।

गंगा सहाय मीणा समय के हिसाब से माध्‍यम बदलते हैं. जब इंटरनेट आया तो लगा कि किताबें खत्‍म हो जायेंगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 24 घंटे वाले न्‍यूज चैनल आए तो लगा अब अखबार कौन पढेगा, लेकिन अखबार बने हुए हैं पूरी ताकत के साथ. उसी तरह फेसबुक आने पर ब्‍लॉग्‍स को खतरा पैदा हुआ है, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि वे बने रहेंगे और प्रसार भी बढेगा. हम अपने ब्‍लॉग्‍स के लिंक फेसबुक पर शेयर कर सकते हैं. वैसे फेसबुक भी बहस का अच्‍छा मंच हो सकता है. मुझे तो यह भी लगता हे कि फेसबुक पर होने वाली गंभीर बहसों को ब्‍लॉग और प्रिंट मीडिया में जगह दी जानी चाहिए.

Dilip Kawathekar यही बात मुझे इतने दिनों से चुभ रही है, क्योंखि यह २०-२० क्रिकेट है, ५०० शब्दों में सिमटा हुआ संसार....@मीणा जी का सुझाव अच्छा है, लिंक वाला.

सुयश सुप्रभ Suyash Suprabh हमें ब्लॉग पर ध्यान देना चाहिए। फ़ेसबुक पर हमारे संदेशों की उम्र बहुत कम होती है। ब्लॉग पर हर पोस्ट का अपना लिंक होता है। इससे हम विचारों को अलग-अलग मंचों तक पहुँचा सकते हैं। वैसे मैं जो कह रहा हूँ उसका पालन करना मेरे लिए भी आसान नहीं है। फ़ेसबुक पर टिप्पणियाँ बहुत जल्दी मिलती हैं। इन टिप्पणियों से जो संवाद स्थापित होता है उसका आकर्षण ही लोगों को फ़ेसबुक तक खींच लाता है।

Aflatoon Afloo फेसबुक से ब्लॉग पर पहुंच कर उसे पढ़ने के बाद भी टीप ’फेसबुक’ पर ही देना आम है । यह तो आलस्य नहीं है। क्यों ?

Lovely Goswami फेसबुक में गाली -गलौज कम होती है इसलिए ...ब्लोग्स में कुछ गुट्बाज प्रतिक्रियावादी सिर्फ इसी काम के लिए दिन -रात लगे रहते हैं

Vishnu Bairagi मुझे लगता है, यह संक्रमण-काल है। फेस बुक की अपनी विशेषताऍं/उपयोगिता है और ब्‍लॉग की अपनी। मालवी की एक कहावत है - 'आम्‍बा की भूख आमली से नी जाय।' अर्थात् आम की भूख इमली से नहीं मिटती। सो, ब्‍लॉग आम है और फेस बुक इमली। फेस बुक 'पानी केरा बुदबुदा' समान और ब्‍लॉग 'अनश्‍वर' की तरह है। फेस बुक '20-20' और ब्‍लॉग 'टेस्‍ट' की तरह है। आलस्‍य वाली आपकी बात बिलकुल ठीक है।

मेरे साथ ऐसा कुछ बार हुआ कि मैंने फेस बुक पर या बज पर टिप्‍पणी कर दी और मान लिया कि मैंने ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी की है। किन्‍तु जब वास्‍तविकता सामने आई तब से मैंने तय कर लिया कि टिप्‍पणी केवल ब्‍लॉग पर करूँगा, और कहीं नहीं।

Sharma Ramakant मेरा तो मानना यह है कि फेसबुक पर लोगों की सृजनात्मकता में इज़ाफा हुआ है . यह मंच बेहद महत्वपूर्ण है . इसकी सार्थकता को बनाये रखना हम सभी की जिम्मेदारी है .

सुयश सुप्रभ Suyash Suprabh ऐसे अनेक ब्लॉग हैं जिन्हें पाठक नियमित रूप से पढ़ते हैं। इन ब्लॉगों पर जो टिप्पणियाँ आती हैं वे सभी पाठकों के लिए हमेशा सुलभ होती हैं। फ़ेसबुक पर ऐसा नहीं होता है। इस पर दूसरों के प्रोफ़ाइल पेज पर पुराने संदेश ढूँढ़ना आसान नहीं होता है।

Tara Chandra Gupta sahi kah rahe hain sir ji

Abhay Tiwari छोटी-मोटी बातें यहीं कह-सुन लीं जाती हैं, लम्बी चौड़ी बातों के लिए अभी भी ब्लौग ही है, कम से कम मेरे लिए तो है। ये ज़रूर है कि ये अहम मंच हो गया है।

जेएनयू के मजदूरों के घरों में '‍अभिज्ञान' का प्रकाश



'अभिज्ञान' का गठन 2005 में जेएनयू के कुछ विद्यार्थियों द्वारा मजदूरों के बच्चों को शिक्षा के प्रकाश तक पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया. इन दिनों जेएनयू में बडे पैमाने पर निमार्णकार्य चल रहे हैं. नए हॉस्टल, एकेडेमिक कॉम्लेक्स और फैकल्टी क्वार्टर्स का निर्माण हो रहा है. इनमें हजारों की तादाद में मजदूर कार्य कर रहे हैं. ये मजदूर जेएनयू कैंपस में कच्चे घर बनाकर रह रहे हैं. कैंपस परिसर में तीन विद्यालय होने के बावजूद सरकार के 'शिक्षा का अधिकार' की रोशनी मजदूरों के इन बच्चों तक नहीं पहुंच पाई है. इन बच्चों को इस अंधकार से पढाई के प्रकाश की ओर ले जाने का बीडा 'अभिज्ञान' ने उठाया है. इसमें जेएनयू में अध्येयन कर रहे कई विदेशी विद्यार्थी भी सक्रिय हैं. 'अभिज्ञान' की एक प्रमुख और सक्रिय कार्यकर्ता यज्ञासेनी बारेठ बताती हैं कि 'अभिज्ञान' द्वारा अभी तक 56 बच्चों को मुनिरका और बेर सराय के सरकारी स्कूलों में नियमित दाखिला दिलाया जा चुका है. हम हर शुक्र, शनि और रविवार को बच्चों को पढाने के अलावा खेलकूद, नृत्य -संगीत, हस्तशिल्प आदि से जोडने की कोशिश करते हैं.' यज्ञासेनी आगे कहती हैं कि 'हम इन विस्थापित परिवारों और उनके बच्चों के स्वास्‍थ्‍य को लेकर भी चिंतित हैं और समय-समय पर इनकी जांच कराते रहते हैं'.

'अभिज्ञान' के बारे में YouTube पर डॉक्‍यूमेन्‍ट्री देखें-
http://www.youtube.com/watch?v=2qV87FRcSeI&feature=related

अन्‍वेषण

जब से
लगा में कुछ जानने
चीजों को पहचानने,
तब से ही
यह प्रश्‍न
मुझे
लगातार झकझोरता रहता है
कि कौन हूं मैं
और
क्‍या है मेरे जन्‍म का उद्देश्‍य !
क्‍यूं आया हूं मैं
इस अलौकिक से संसार में !


कभी लगता है
कि मैं
एक अदृश्‍य शक्तिपुंज का अंश हूं
कभी लगता है
नहीं
मैं तो प्रकृति की कुछ क्रियाओं का परिणाम हूं.

अगले ही पल
सोचता हूं
क्‍यों पडा हूं मैं इस चक्‍कर में !
मैं तो अपने मां-बाप की संतान हूं
जिस प्रश्‍न का आज तक
कोई भी
नहीं खोज पाया
एक पूर्ण सा उत्‍तर
मैं क्‍या खोज पाऊंगा
उस अनुत्‍तरित प्रश्‍न का उत्‍तर !

यहीं आकर
बाधित हो जाता है
अन्‍वेषण.


(2001-02 में लिखी हुई मेरी एक कविता)

सरकार (लघुकथा) -गंगा सहाय मीणा

मैं 14-15 साल का हो गया था लेकिन मैंने कभी सरकार को नहीं देखा. मैं किताबों-अखबारों में पढकर और लोगों से सुन-सुनकर तंग आ गया था कि सरकार ये कर रही है, वो कर रही है, सरकार ने ये कहा, वो कहा. आखिर सरकार है कौन, कैसी दिखती है? बोतल से निकले जिन/भूत की तरह तो नहीं? ये सवाल मुझे उन दिनों बहुत परेशान करता था.

अंततः एक दिन मेरा भाग्य जागा और मुझे सरकार के दर्शन हो गए. मैं अपने पिताजी के साथ पास के शहर गया, वहां मुझे सरकार एक तिराहे पर खडी दिखी. सरकार एक जीप की शक्ल में थी, जिसमें 3-4 पुलिसवाले थे. जीप पर सरकार का नाम लिखा हुआ था- राजस्थान सरकार. सरकार को जीप के रूप में देखकर पहले तो आश्‍चर्य हुआ लेकिन बाद में सोच लिया कि लोग कहते हैं कि सरकार सर्वशक्तिशाली है, इसलिए बहुरूपिया भी होगी. अपनी आवश्यतकतानुसार रूप बदल लेती होगी.

सरकार तिराहे पर जीप की शक्ल में आकर रुकी. उसे देखते ही आसपास के माहौल में सक्रियता आ गई. पुलिस वाले भी जीप में से उतर कर सक्रिय हो गए. वहां खडे ऑटो रिक्शों की हवा निकालने लगे और रिक्शा चालकों को गाली और थप्पड मारने लगे. रिक्शेवाले हवारहित ट्यूब वाले रिक्शों को भी लेकर भी दौड पडे.

सरकार को मैंने पहली बार देखा था. सारी घटना का कुछ कार्य-कारण समझ में नहीं आया. लेकिन उसे देखकर मुझे भी डर लगने लगा
 
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