पूस की एक और रात (कहानी)


पूस की एक और रात
(कहानी)
गंगा सहाय मीणा

21वीं सदी का पहला दशक बीत जाने के बाद के एक बरस का पूस का महीना।

हफ्तेभर की कोशिश के बाद आखिरकार भूरी की सरसों भराने की बारी आ गई। रामजीलाल पटेल ने मिस कॉल करके हरकेश मास्टर को बताया, ‘माड़साब, आज रात आठ बजे से तमारो नंबरअ!’

शिक्षामित्र के रूप में हरकेश जिस गाँव में काम कर रहा था, वह गंगापुर से दो सौ किलोमीटर से ज्यादा ही होगा। वह हर शनिवार शाम अपने गाँव आ जाता था और सोमवार सुबह पाँच बजे वाली बस से चला जाता था। अर्धवार्षिक परिक्षाओं की वजह से न इतनी आसानी से छुट्टी मिल सकती थी और न ही इतनी जल्दी गाँव पहुॅंचा जा सकता था। समझ नहीं पाया, हां करे या ना! दस दिन बाद सर्दी की छुट्टियों में तो गाँव जाना ही था लेकिन तब तक देर हो जाएगी।

उसने भूरी को पड़ौसी के मोबाइल पर फोन मिलाकर राय ली तो भूरी ने थोड़े संकोच के साथ ‘हां’ कर दिया। हरकेश ने अपनी जीजी  से भी बात की और इस बिंदु पर सहमति बनी कि सरसों आज ही भराएँगे लेकिन कूड मोड़ने  के लिए एक मजूर भी कर लेंगे।

भूरी मजूर कर आई। तीन सौ रुपये में मजूर हुआ। आधी रात के लिए।

भूरी ने दोनों बच्चों को खाना खिलाकर सुलाया। भैंस और पडिया को साँदी-पाणी दिया। दोनों, सास-बहू, ने खाना खाया। इतने में रमेश बैरवा भी आ पहुँचा। भूरी ने एक शॉल और उसकी सास ने एक पुराना कंबल लिया जो हरकेश के पिताजी कुंभ के मेले से लाये थे। एक टॉर्च और गैस लेकर तीनों बगीचे वाले खेत की ओर चले।

चार-पाँच साल पहले तक बगीचे वाले कुएँ में काम लायक पाणी हो जाता था। दस-बारह साल पहले तो यहां पाणी की कोई कमी नहीं थी। सवाई माधोपुर-करौली जिले राजस्थान में भले ही आते हों, लेकिन यहां पाणी की किल्लत नहीं रही। पाँचना बाँध से कई नहरें निकल रही थीं। ज्यादातर गाँवों में बड़े तालाब थे जो लगभग हर साल भर जाया करते थे। गंगापुर से करौली जाने वाली सड़क पर बसे, सरसों के बीज के लिए प्रसिद्ध, मीणा पहाड़ी गाँव में उन दिनों दस से पंद्रह हाथ पर कुओं में पाणी था। सब लोग लेज -बाल्टी लेकर कुओं पर नहाने जाते थे। अब गाँव में नल लग गए और कुंडे खुद गए। सब घर पर ही नहाते हैं। पूरा गाँव कीचड़भरी नाली में तब्दील हो गया है। गाँव के मुख्य रास्तों पर सीमेंट की सड़क तो बन गई लेकिन नालियां नहीं बनाई गईं। सड़क पर बढ़ रहे कीचड़ ने शहरों के बाशिंदे विभिन्न प्रजातियों के मच्छरों को न्योता दिया और लुभाया है। वैसे भी अब शहरों में मच्छरों का गुजारा इतना आसान नहीं रहा।

जब कुओं में पाणी था तो गाँव में सिंचाई भी काफी आसान थी। हर कुटुंब के हर इलाके के खेतों के साथ कुएँ हैं। बुजुर्गों ने इन कुओं को खुद ही खोदा और बाँधा था। पानी कम होने पर वे खुद ही बल्ली लगा लेते थे। बगीचे वाले कुएँ को खोदने और बाँधने में हरकेश के पिताजी ने सबसे ज्यादा काम किया था। खुद महीनेभर तक कुएँ में उतरे रहे। कुओं में ऊपर पानी होने का फायदा यह था कि साधारण इंजनों द्वारा आसानी से सिंचाई हो जाती थी जिसमें प्रतिघंटे औसतन एक लीटर डीजल जलता था। यानी किफायती और आसान। सरसों को चाहिए भी कितने पानी- एक या दो। इंजनों से पहले नाव चलाकर सिंचाई की जाती थी जो काफी मुश्किल थी। उसमें लगी मेहनत को याद कर बड़े-बूढ़े आज भी सिहर उठते हैं।

मीणा पहाड़ी के दक्षिण पूर्व में एक पहाड़ी थी और उसके थोड़ा आगे लंबा डूँगर। डूँगर, गाँव और खेतों से निकलने वाले बारिश के पानी के सारे रास्ते आपस में मिलते हुए तालाब पर पहुँचते थे। इससे लगभग एक किलोमीटर लंबा-चैड़ा तालाब हर साल भर जाता था। एक बार तो तालाब टूटने की नौबत आ गई। आधी रात को जाकर गाँव वालों ने समय रहते कोने वाली मोरी खोल दी और तालाब टूटने से बचा लिया।

धीरे-धीरे इस जनजाति बहुल गाँव में भी लोगों में स्वार्थपरता घर करती गई और उन्होंने अपने खेत के पास से गुजरने वाले बरसाती नाले की तरफ अपने-अपने खेतों को बढ़ाना शुरू किया, अपने खेतों का पानी मजबूत डौड़ बनाकर अपने खेतों में ही रोक लिया तथा जिन लोगों के खेतों में होकर पानी बड़े तालाब तक पहुँचता था, उन्होंने भी डौड़ कर दी। फलस्वरूप तालाब का भरना बंद हो गया। जिससे पूरे गाँव में जलस्तर नीचे जाता रहा और एक दशक से भी कम समय में भरे रहने वाले कुएँ हमेशा के लिए सूख गए।

इसके बाद गाँव के बड़े किसानों ने बोरिंग करना शुरू किया। बोरिंग से सिंचाई महँगी हुई और मुश्किल भी। एक बोर करने में तीन-चार लाख तक का खर्च सामान्य था। उस पर बोर फेल होने का खतरा अलग।

परिणाम यह हुआ कि बोर मालिकों ने दूसरे किसानों के खेतों में सिंचाई कर इस खर्च को निकालना शुरू कर दिया। गाँव में कुल मिलाकर आधा दर्जन ही बोर थे इसलिए किसानों की भी मजबूरी थी उनसे महॅंगी रेट पर पाणी लेने की। बोर मालिक दिन में अपने खेतों को भराते थे और रात में दूसरे किसानों को पाणी देते। हरकेश और रामजीलाल के बीच चार सौ रुपये प्रतिघंटे की रेट तय हुई थी।

हरकेश के पिताजी को गुजरे 15 साल हो गए थे। पिताजी के जाने के बाद जीजी भी तेजी से बूढ़ी हुई। उनके पास कुल साढ़े पाँच बीघा जमीन थी। बहन की शादी करने में चार लाख से ऊपर कर्ज हो गया था। दो रुपया सैंकड़ा की कटतीमिती  की ब्याज दर ने पूरे परिवार का हाजमा खराब कर रखा था। जमीन में गुजारा संभव नहीं था, इसलिए पहले हरकेश की जीजी और अब भूरी मिस्टाॅल  पर काम करती थी। दोनों ने मजूरी भी खूब की है। जीजी का शरीर अब मजूरी करने लायक नहीं रहा। वह थोड़ा-बहुत बच्चों और घर का काम देख लेती थी। छोटे भाई को हरकेश ने बी.ए. के बाद जयपुर तैयारी करने भेज दिया। घर में आदमी कम होने की वजह से बीच-बीच में हरकेश के परिवार को भी मजूर की जरूरत पड़ जाती थी। खासतौर पर लावणी के दिनों में।

बगीचे वाला खेत एक बीघा से कुछ कम ही था। हरकेश सबको पौण बीघा बताता। नाप के हिसाब से यह सौलह बिसवा था।

भूरी पहुँचते ही झम्मन को पाणी चालू करने के लिए कह आई। रामजीलाल पटेल ने बोर पर झम्मन को रखा हुआ था। झम्मन के पिताजी ने रामजीलाल पटेल से बेटी की शादी और छोटे बेटे को बी. एड. कराने के लिए कर्ज लिया था, जो वह अभी तक चुका नहीं पाया था।

भूरी की सास खेत किनारे बगीचे की डौड़ पर कंबल ओढ़कर बैठ गई। साढे नौ बजे बोर चालू हुआ। भूरी ने गैस क्यारी के पास वाली डौड़ पर रख दिया। भूरी और रमेश सरसों के खेत में कूड मोड़ने लगे।

उतरते पूस की काली रात थी। थोड़ा कोहरा भी था। ठंड जोरों पर थी। शाम से पर्वाई पौन चल रही थी। भूरी पानी में उतरी हुई थी। उसकी सास बीच-बीच में मठार  देती थी। भूरी रमेश से कहती, ‘रमेश, देखतो रह्ज्यो। हड़ाई भर जाय तो बता दीज्यौ। मैं पाणी दूसरी हड़ाई में मोड़ दूंगी।’

दो घंटे में लगभग आधा खेत भर गया। रमेश बीच-बीच में बीड़ी जलाकर सर्दी से टक्कर ले रहा था। भूरी सलवार कुर्ते में थी जो उसने हरकेश के साथ नौकरी पर जाने के लिए सिलवाये थे। उसकी सलवार घुटने से थोड़ा ऊपर तक भीगी हुई थी। उसने टाॅर्च गले में लटका रखी थी।

सहसा भूरी को महसूस हुआ कि ये वाली क्यारी भरने में कुछ ज्यादा वक्त लग रहा है। उसने रमेश से कहा कि ‘देख कहीं पाणी फूट्यो तो नीय’? रमेश ने हर तरफ देखा लेकिन कहीं पाणी फूटा नहीं मिला।

भूरी रमेश के जवाब से संतुष्ट नहीं हुई। टाॅर्च से उसने खुद जाँच की। पाणी कहीं फूटा नहीं था। उसने गौर से बरे का भी निरीक्षण किया। वह भी नहीं फूटा था। फिर उसने पाइप के मुँह पर टाॅर्च डालकर देखा। वह देखकर सन्न रह गई। उसने देखा कि पानी की चाल आधी से कम हो गई है। उसे ये झम्मन की शरारत महसूस हुई। वह पाणी पर रमेश को लगाकर सीधे रास्ते से दौड़ती हुई बोर पर गई। देखा, झम्मन कमरेनुमा तिवारे में सो रहा था और बोर में पानी पूरा आ रहा था।

भूरी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था और कुल पलों तक वह किंकर्तव्‍यविमूढ़ होकर खड़ी रही। अचानक उसके दिमाग में कुछ कौंधा। उसने पाइप के साथ-साथ खेत की ओर चलना शुरू किया। बोर से खेत की दूरी एक किलोमीटर से ऊपर ही थी। भूरी पाइप के किनारे-किनारे चलती गई और बीच-बीच में पाइप को छूकर देखती रही। पानी पूरा आ रहा था।

भूरी ने जर्सी पहनी हुई थी और शाॅल लपेटा हुआ था लेकिन ठिठुरनभरी हवा ने उसे कँपकँपाना शुरू कर दिया। घुटने से ऊपर तक भीगी सलवार पर लग रही हवा शीत का क्षेत्र विस्तार कर रही थी। वह खेत के एकदम करीब पहुंच गई लेकिन उसे पाइप में कोई दिक्कत नहीं मिली।

‘छपाक’ की आवाज के साथ अचानक उसका पाँव पाणी में पड़ा। वह रुकी। उसने टाॅर्च जलाकर देखा। भैरो के खेत में पाणी भरा हुआ था। उसको समझते देर नहीं लगी। थोड़ी आगे पाइप फटा हुआ था। भूरी समझ नहीं पाई कि पाइप कैसे फटा होगा और कैसे बहते पाणी को रोके! एक बार तो उसने सोचा वापस जाकर झम्मन को जगाए और पाणी बंद करने के लिए कहे। लेकिन अगले ही पल उसे खयाल आया कि पाणी बंद करवा दिया तो उनका खेत कैसे भरेगा! और पता चला फिर नंबर ही न आए!

उसने सिर और कानों को ढककर ओढ़ा हुआ शाॅल उतारा और टूटा पाइप बांधने में जुट गई। बाँधने की प्रक्रिया में पाणी की पिचकारियाँ उसको भिगो रही थी। उसने कुछ मिनटों की मशक्कत के बाद टूटे हुए पाइप को कुछ इस तरह से बाँध दिया कि उसमें से पानी बहना लगभग बंद हो गया। बस शाॅल में से रिस-रिसकर थोड़ा पानी निकल रहा था।

जब पाइप की मरम्मत हो गई तो भूरी को अहसास हुआ, वह पूरी तरह भीग चुकी थी। वह ज्यों-ज्यों खेत की तरफ बढ़ रही थी, पर्वाई पौन उसकी हड्डियों तक पहुँचती चली जा रही थी। जर्सी भीग चुकी थी और बालों में भी पाणी पहुँच चुका था। उसने खेत में पहुँचकर देखा, पाणी की चाल ठीक थी।

भूरी की बूढ़ी सास खुद को जगाए रखने के लिए आग जलाकर बैठी थी और कोई मीणावाटी गीत गुनगुना रही थी। रमेश बीड़ी पी रहा था। उसे रमेश पर गुस्सा आया कि पैसे तो पूरे ले लेगा लेकिन ठीक से कूड नहीं मोड़ रहा।
आधी से ज्यादा रात जा चुकी थी। जब भूरी को असहनीय ठंड महसूस हुई तो वह अपनी सास के पास आग तापने पहुंच गई। अब खेत थोड़ा ही बचा था। लेकिन शीत खाल, माँस और हड्डियों को चीरता हुआ बदन के आर-पार हो रहा था। सास के पास सुलगती आग में उसे सुकून महसूस होने लगा। उसे याद आई वे तमाम रातें जो उसने और हरकेश ने खेतों पर कूड मोड़ते हुए बिताई थी, दोनों ने एक-दूसरे को गरम किया था और सुबह संतुष्ट होकर घर लौटे थे।

आग के पास बैठने से भूरी को थोड़ी राहत जरूर मिली लेकिन इससे उसके शरीर में आलस छाने लगा। उसकी हाथों और पाँवों की अंगुलियाँ सूज गई थी। उनमें खून जम गया। उसने आग में अपने हाथ-पाँव इतने करीब से सेंके कि ऊपर से खाल जलने को हो गई और अंदर खून बर्फ बना हुआ था, जैसे गीले आटे की रोटी को तेज आँच पर सेंकने पर होता है।

उसका दोबारा पानी में उतरने का साहस नहीं हो रहा था लेकिन जैसे ही उसे चार सौ रुपये घंटे का अहसास हुआ, वह पानी में उतर गई और किसी युद्ध में अपने पक्ष के बचे आखिरी योद्धा की भाँति तब तक कूड मोड़ती रही जब तक खेत भर नहीं गया।

लगभग तीन बजे थे। उसकी बूढ़ी सास बुझ चुके अलाव के पास आम के पेड़ से पीठ लगाकर ऊँघ रही थी। रमेश ने घर लौटने की तैयारी के रूप में आखिरी बीड़ी जला ली थी। भूरी भीगे कपड़ों में पाणी बंद कराने के लिए बोर की तरफ बढ़ी चली जा रही थी।

(साभार- परिकथा (नवलेखन अंक) जनवरी-फरवरी 2015)

आदिवासी साहित्‍य की पृष्‍ठभूमि

मई के लाइव इंडिया में प्रकाशित वंदना टेटे द्वारा लिखित पुस्‍तक ‘आदिवासी साहित्‍य : परंपरा और प्रयोजन’ पुस्‍तक की समीक्षा. 

गणतंत्र (कविता)


गणतंत्र
-गंगा सहाय मीणा


क्‍या है गणतंत्र? 

तिरंगा झंडा?
राजपथ की परेड?
राष्‍ट्रपति की बघ्‍घी?
तोपों की सलामी?
दिल में इंडिया?
जुबां पे वंदे मातरम?
या भारत माता की जय?

नहीं साथी,

इनमें से कुछ नहीं!

गणतंत्र है

दलित का भीमा
आदिवासी का बिरसा
औरत का प्रतिरोध
मंडल आयोग
सच्‍चर की सिफारिशें
इंसान की ख्‍वाहिशें
और
वह सबकुछ
जो इंसान-इंसान की
बराबरी के लिए
किया जाना बाकी है.

मजबूत हुई है प्रतिरोध की संस्‍कृति


मजबूत हुई है प्रतिरोध की संस्‍कृति

डॉ. गंगा सहाय मीणा

स. प्रोफेसर, भारतीय भाषा केन्‍द्र, जेएनयू

   सभ्‍यता, परंपरा, संस्‍कृति आदि की बात करते वक्‍त सामान्‍यतया हम अतीत को गौरवान्वित करते हुए वर्तमान की आलोचना करते हैं. हमारे कहने का भाव कुछ इस तरह का होता है कि पहले सबकुछ ठीक था, चारों ओर सुख-शांति थी और अब मानवीय सभ्‍यता मूल्‍यों के पतन के कारण खतरे में है. इसके लिए अक्‍सर पश्चिमी सभ्‍यता को जिम्‍मेदार ठहराया जाता है. दरअसल यह भारतीय अतीत से लाभान्वित समुदायों के वंशजों की राय है, जिसका उन्‍होंने इतना प्रचार किया कि इसे तमाम भारतीयों की राय माने जाने का भ्रम हुआ.

किसी भी चीज को देखने का एक दृष्टिबिंदु होता है, जो उस मुद्दे के बारे में हमारी राय बनाता है. यानी यह बहुत महत्‍वपूर्ण है कि हम किसी प्रश्‍न को कहां से देख रहे हैं. हजारों वर्षों तक सत्‍ता में काबिज लोगों को वंशजों को वर्तमान सांस्‍कृतिक पतन होता हुआ दिख रहा है क्‍योंकि उस तबके के सत्‍ता में बने रहने को वंचितों द्वारा लगातार चुनौतियां दी जा रही हैं.

संस्‍कृति कोई जड़ चीज नहीं है और भारतीय संदर्भ में इसके एकरूप होने का दावा भी खोखला है. जिन परंपराओं को अभी तक महान संस्‍कृति कहकर गौरवान्वित किया जाता रहा, उनमें से अधिकांश का संबंध समाजिक और लैंगिक गैर-बराबरी से है. आज जब हम लोकतांत्रिक समाज में रह रहे हैं और एक समतामूलक समाज का सपना हम सभी के दिलो-दिमाग में है, तो हमें अपने इतिहास, सभ्‍यता, परंपराओं आदि के साथ संस्‍कृति पर भी पुनर्विचार करने की जरूरत है. सामाजिक गैर-बराबरी से जुड़े संस्‍कृति के प्राचीन केन्‍द्रों के ध्‍वस्‍त होने पर विलाप करने की बजाय उल्‍लास मनाने की जरूरत है. हमारा वर्तमान सीमाओं से मुक्‍त नहीं है लेकिन अब हमें अतीत को गौरवान्वित करने की लत छोड़नी होगी. तमाम सीमाओं के बावजूद आज भारतीय समाज में विभिन्‍न गैर-बराबरियां जितनी कम हुई हैं, उतनी इतिहास में कभी नहीं थी. विभिन्‍न तबकों की स्थिति सुधरने के साथ वे अपनी सांस्‍कृतिक विरासत को भी सुधारने में लगे हैं.

भारत असंख्‍य संस्‍कृतियों का देश है. स्‍वयं हिंदी प्रदेश भी बहुभाषी और बहु-सांस्‍कृतिक प्रदेश है. चीजों का बदलना पतन ही हो, यह जरूरी नहीं. यह सच है कि समय बहुत तेजी के साथ बदल रहा है. उसी के अनुरूप संस्‍कृति भी बदल रही है. पुस्‍तकों की जगह इंटरनेट ने ले ली है. अब न आपके ऊपर संपादक की धौंस है, न किसी और का डर- आप इंटरनेट पर जाकर कुछ भी पढ़ सकते हैं, लिख सकते हैं, फीडबैक दे सकते हैं, फीडबैक प्राप्‍त कर सकते हैं आदि. लिखने और पढ़ने के क्षेत्र में ऐसा लोकतांत्रिक माहौल पहले कभी नहीं था. हमारे जीवन और संस्‍कृति में आ रहे इन बदलावों के प्रति हमें सतर्क रहने की जरूरत है क्‍योंकि इन्‍हीं बदलावों के बीच बाज़ार अपने पांव पसार रहा है. बाजार का एक ही मूल्‍य है- मुनाफा, इसलिए हमारे सांस्‍कृतिक जीवन में इसके दखल के प्रति हमें सावधान रहना होगा. पिछले दिनों हुए सांस्‍कृतिक बदलावों से निकली सबसे मजबूत चीज है- प्रतिरोध की संस्‍कृति. उत्‍पीडि़त तबके अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए संगठित हो रहे है. निष्‍कर्षतः यही कहा जा सकता है कि संस्‍कृति कोई जड़ नहीं, निरंतर परिवर्तनशील अवधारणा है. हिंदी प्रदेश में विविध संस्‍कृतियां समय का दबाव झेलते हुए बदलती हुई आगे बढ़ रही है. इस बदलाव पर विस्‍तृत अध्‍ययन अपेक्षित है.

(शुक्रवार 'साहित्‍य वार्षिकी 2014' से साभार)

आदिवासी साहित्‍य - डॉ. गंगा सहाय मीणा


जनसत्ता 7 फरवरी, 2013: इस बार दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले का केंद्रीय विषय है: ‘देशज आवाजें- भारत के लोक और आदिवासी साहित्य का मानचित्रण और प्रकाशन’। लिहाजा, आदिवासी साहित्य की दशा-दिशा पर विचार करने का यह उपयुक्त अवसर है। यह भारतीय समाज, राजनीति और साहित्य में उत्पीड़ित अस्मिताओं के मुक्तिकामी संघर्षों का दौर है। बीसवीं सदी के आखिरी दशकों में भारत में नए सामाजिक आंदोलनों का उभार हुआ। स्त्रियों, किसानों, दलितों, आदिवासियों और जातीयताओं की ‘नई’ एकजुटता ने ऐसी मांगें और मुद्दे उठाए जो स्थापित सैद्घांतिक और राजनीतिक मुहावरों के माध्यम से आसानी से समझे और सुलझाए नहीं जा सकते थे।
इन समूहों ने अपने शोषण के लिए अपनी खास अस्मिता को कारण बताया और उस शोषण और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष के लिए उस संबंधित अस्मिता वाले समुदाय को साथ लेकर अपनी मुक्ति के लिए सामूहिक अभियान चलाया। चूंकि इस प्रक्रिया में शोषण और संघर्ष का आधार सामुदायिक पहचान है, इसलिए इसे अस्मितावाद की संज्ञा दी गई। वंचितों के शोषण के खिलाफ खड़ी हुई मुहिम में सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के अलावा साहित्यिक आंदोलन ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। स्त्रीवादी साहित्य और दलित साहित्य उसी का प्रतिफल है। अब आदिवासी चेतना से लैस साहित्य भी साहित्य और आलोचना की दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है।
आदिवासी लोक में साहित्य सहित विविध कला-माध्यमों का विकास तथाकथित मुख्यधारा से पहले हो चुका था, लेकिन वहां साहित्य सृजन की परंपरा मूलत: मौखिक रही। जंगलों में खदेड़ दिए जाने के बाद भी आदिवासी समाज ने इस परंपरा को अनवरत जारी रखा। ठेठ जनभाषा में होने और सत्ता प्रतिष्ठानों से दूरी की वजह से यह साहित्य आदिवासी समाज की ही तरह उपेक्षा का शिकार हुआ। आज भी सैकड़ों देशज भाषाओं में आदिवासी साहित्य रचा जा रहा है, जिसमें से अधिकांश से हमारा संवाद कायम होना अभी शेष है।
मुक्त व्यापार और मुक्त बाजार के नाम पर मुनाफे और लूट का खेल आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन हथियाने से भी आगे जाकर उनके जीवन को दांव पर लगा कर खेला जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में अकेले झारखंड राज्य में दस लाख से अधिक आदिवासी विस्थापित हुएहैं। इनमें से अधिकतर लोग दिल्ली जैसे महानगरों में घरेलू नौकर या दिहाड़ी पर काम करते हैं। विडंबना यह है कि सरकार के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में मूलत: कोई आदिवासी नहीं है, इसलिए यहां की शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में आदिवासियों के लिए आरक्षण या कोई विशेष प्रावधान नहीं है। विकास के नाम पर अपने पुश्तैनी क्षेत्रों से बेदखल किए गए ये लोग जाएं तो कहां जाएं?
सरकार के पास इनके पुनर्वास की कोई योजना नहीं है। अपने जल-जंगल-जमीन से बेदखल महानगरों में शोषित-उपेक्षित आदिवासी किस आधार पर इसे अपना देश कहें? बाजार और सत्ता के गठजोड़ ने आदिवासियों के सामने अस्तित्व की चुनौती खड़ी कर दी है। जो लोग आदिवासी इलाकों में बच गए, वे सरकार और उग्र वामपंथ की दोहरी हिंसा में फंसे हैं। अन्यत्र बसे आदिवासियों की स्थिति बिना जड़ के पेड़ जैसी हो गई है। नदियों, पहाड़ों, जंगलों, आदिवासी पड़ोस के बिना उनकी भाषा और संस्कृति, और उससे निर्मित होने वाली पहचान ही कहीं खोती जा रही है।
आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व के लिए इतना गहरा संकट इससे पहले नहीं पैदा हुआ। जब सवाल अस्तित्व का हो तो प्रतिरोध भी स्वाभाविक है। सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध के अलावा कला और साहित्य के द्वारा भी प्रतिकार की आवाजें उठीं, और वही समकालीन आदिवासी साहित्य का मुख्य स्वर हो गया।
जब-जब दिकुओं ने आदिवासी जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप किया, आदिवासियों ने उसका प्रतिरोध किया है। पिछली दो सदियां आदिवासी विद्रोहों की गवाह रही हैं। इन विद्रोहों से रचनात्मक ऊर्जा भी निकली, लेकिन वह मौखिक ही अधिक रही। संचार माध्यमों के अभाव में वह राष्टÑीय रूप नहीं धारण कर सकी। समय-समय पर गैर-आदिवासी रचनाकारों ने भी आदिवासी जीवन और समाज को अभिव्यक्त किया। साहित्य में आदिवासी जीवन की प्रस्तुति की इस पूरी परंपरा को हम समकालीन आदिवासी साहित्य की पृष्ठभूमि के तौर पर रख सकते हैं।
कोई भी साहित्यिक आंदोलन किसी तिथि विशेष से अचानक शुरू नहीं हो जाता। उसके उद्भव और विकास में तमाम परिस्थितियां अपनी भूमिका निभाती हैं। समकालीन आदिवासी लेखन और विमर्श की शुरुआत हमें 1991 के बाद से माननी चाहिए। नई आर्थिक नीतियों ने आदिवासी शोषण-उत्पीड़न की प्रक्रिया तेज की, इसलिए उसका प्रतिरोध भी मुखर हुआ। प्रतिरोध का स्वरूप राष्टÑीय था, इसलिए प्रतिरोध से निकली रचनात्मक ऊर्जा देश भर में फूटी। इसमें आदिवासी और गैर-आदिवासी रचनाकार, दोनों बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। इस साहित्य का भूगोल, समाज, भाषा, संदर्भ शेष साहित्य से उसी तरह पृथक है जैसे स्वयं आदिवासी समाज, और यही पार्थक्य इसकी मुख्य विशेषता है।
यह आदिवासी साहित्य की अवधारणा के निर्माण का दौर है। आदिवासी साहित्य अस्मिता की खोज, दिकुओं द्वारा किए गए और किए जा रहे शोषण के विभिन्न रूपों के उद्घाटन और आदिवासियों पर मंडराते संकटों और उनके मद््देनजर हो रहे प्रतिरोध का साहित्य है। यह उस परिवर्तनकामी चेतना का रचनात्मक हस्तक्षेप है जो देश के मूल   निवासियों के वंशजों के प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव का पुरजोर विरोध करती है और उनके जल, जंगल, जमीन को बचाने के हक में उनके ‘आत्मनिर्णय’ के अधिकार के साथ खड़ी होती है।
हालांकि यह समकालीन आदिवासी लेखन और विमर्श का आरंभिक दौर है लेकिन इसके बावजूद यह सुखद है कि इसमें अभी तक ‘स्वानुभूति बनाम सहानुभूति’ जैसी छद्म बहसें केंद्र से दूर परिधि के इर्दगिर्द ही घूम रही हैं। आखिर स्वानुभूति या

अनुभूति की प्रामाणिकता को केंद्रीय महत्त्व मिले भी क्यों? निश्चय ही अनुभूति की प्रामाणिकता की जगह अभिव्यक्ति की प्रामाणिकता अधिक महत्त्वपूर्ण है और होनी भी चाहिए। यह सच है कि लंबे अनुभव, निकट संपर्क और संवेदनशीलता के बिना प्रामाणिक अभिव्यक्ति संभव नहीं है, खासकर आदिवासी संदर्भ में, लेकिन इसके बावजूद स्वानुभूति को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
आदिवासी साहित्य विमर्श के मुद्दे अभी आकार ले रहे हैं। ‘आदिवासी कौन है’ से शुरू होकर आदिवासी समाज, इतिहास, संस्कृति, भाषा आदि पर पिछले एक दशक में कुछ बातें हुई हैं। हर साहित्यिक आंदोलन की शुरुआत और उसे आगे बढ़ाने में पत्रिकाओं की अहम भूमिका होती है। आदिवासी मुद्दों को उठाने, उनसे जुड़े सृजनात्मक साहित्य को प्रोत्साहन देने में इन पत्रिकाओं ने अहम योगदान दिया है- ‘युद्घरत आम आदमी’ (दिल्ली, हजारीबाग; संपादक रमणिका गुप्ता), ‘अरावली उद्घोष’ (उदयपुर, सं. बीपी वर्मा ‘पथिक’), ‘झारखंडी भाषा साहित्य, संस्कृति अखड़ा’ (रांची, सं.वंदना टेटे), ‘आदिवासी सत्ता’ (दुर्ग, छत्तीसगढ़; सं. केआर शाह) आदि।
इनके अलावा ‘तरंग भारती’ के माध्यम से पुष्पा टेटे, ‘देशज स्वर’ के माध्यम से सुनील मिंज और सांध्य दैनिक ‘झारखंड न्यू्ज लाइन’ के माध्यम से शिशिर टुडु आदिवासी विमर्श को बढ़ाने में लगे हैं। बड़ी संख्या में मुख्यधारा की पत्रिकाओं ने आदिवासी विशेषांक निकाल कर आदिवासी विमर्श को आगे बढ़ाने में मदद की है, जैसे- ‘समकालीन जनमत’ (2003), ‘दस्तक’ (2004), ‘कथाक्रम’(2012), ‘इस्पातिका’ (2012) आदि। शुरू में हिंदी की प्रमुख पत्रिकाओं ने आदिवासी मुद्दों को छापने में उतनी रुचि नहीं दिखाई लेकिन अब विमर्श की बढ़ती स्वीकारोक्ति के साथ ही इन पत्रिकाओं में आदिवासी जीवन को जगह मिलने लगी है। छोटी पत्रिकाओं में आदिवासी लेखकों को पर्याप्त जगह मिल रही है।
समृद्घ मौखिक साहित्य परंपरा का लाभ आदिवासी रचनाकारों को मिला है। आदिवासी साहित्य की उस तरह कोई केंद्रीय विधा नहीं है, जिस तरह स्त्री लेखन और दलित साहित्य की आत्मकथात्मक लेखन की है। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, सभी प्रमुख विधाओं में आदिवासी और गैर-आदिवासी रचनाकारों ने आदिवासी जीवन समाज की प्रस्तुति की है। आदिवासी रचनाकारों ने आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व के संघर्ष में कविता को अपना मुख्य हथियार बनाया है। आदिवासी लेखन में आत्मकथात्मक लेखन केंद्रीय स्थान नहीं बना सका, क्योंकि स्वयं आदिवासी समाज ‘आत्म’ से अधिक समूह में विश्वास करता है। अधिकतर आदिवासी समुदायों में काफी बाद तक भी निजी और निजता की धारणाएं घर नहीं कर पार्इं। परंपरा, संस्कृति, इतिहास से लेकर शोषण और उसका प्रतिरोध- सबकुछ सामूहिक है। समूह की बात आत्मकथा में नहीं, जनकविता में ज्यादा अच्छे से व्यक्त हो सकती है।
आदिवासी साहित्य में आर्इं आदिवासियों की समस्याओं को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा जा सकता है- उपनिवेश काल में साम्राज्यवाद और सामंतवाद के गठजोड़ से पैदा हुई समस्याएं, और दूसरे, आजादी के बाद शासन की जनविरोधी नीतियों और उदारवाद के बाद की समस्याएं। आदिवासी कलम तेजी से अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर रही है। आजादी से पहले आदिवासियों की मूल समस्याएं वनोपज पर प्रतिबंध, तरह-तरह के लगान, महाजनी शोषण, पुलिस-प्रशासन की ज्यादतियां आदि हैं, जबकि आजादी के बाद भारत सरकार द्वारा अपनाए गए विकास के मॉडल ने आदिवासियों से उनके जल, जंगल और जमीन छीन कर उन्हें बेदखल कर दिया। विस्थापन उनके जीवन की मुख्य समस्या बन गई। इस प्रक्रिया में एक ओर उनकी सांस्कृतिक पहचान उनसे छूट रही है, दूसरी ओर उनके अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न खड़ा हो गया है। अगर वे पहचान बचाते हैं तो अस्तित्व पर संकट खड़ा होता है और अगर अस्तित्व बचाते हैं तो सांस्कृतिक पहचान नष्ट होती है, इसलिए आज का आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता का विमर्श है।
दलित और स्त्री साहित्य से भिन्न आदिवासी साहित्य की एक प्रमुख प्रवृत्ति इसमें अन्य उत्पीड़ित अस्मिताओं के प्रति सहयोगी भाव है। स्त्रीवादी साहित्य ने जाति के प्रश्न को नहीं समझा और दलित साहित्य ने स्त्री के सवालों को तरजीह नहीं दी, जिसके फलस्वरूप ‘दलित स्त्री विमर्श’ अस्तित्व में आया। चूंकि आदिवासी समाज में श्रम में भागीदारी के कारण स्त्री अपेक्षया बेहतर स्थिति में रही है, इसलिए साहित्य में भी बड़ी संख्या में स्त्री रचनाकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उनके और अन्य रचनाकारों के माध्यम से आदिवासी साहित्य में स्त्री के सवालों को पर्याप्त जगह मिल रही है। आदिवासी साहित्य अपने दायरे में अन्य उत्पीड़ित अस्मिताओं के प्रति संवेदनशील है।
चूंकि आदिवासी साहित्य अपनी रचनात्मक ऊर्जा आदिवासी विद्रोहों की परंपरा से लेता है, इसलिए उन आंदोलनों की भाषा और भूगोल भी महत्त्वपूर्ण रहा है। हिंदी अधिकांश आदिवासियों की भाषा नहीं है। मुंडारी, संथाली, हो, भीलोरी, ओड़िया, गारो आदि उनकी भाषाएं हैं। आदिवासी रचनाकारों का   मूल साहित्य उनकी इन्हीं भाषाओं में है। हिंदी में मौजूद साहित्य देशज भाषाओं में उपस्थित साहित्य की इसी समृद्घ परंपरा से प्रभावित है। कुछ साहित्य का अनुवाद और रूपांतरण भी हुआ है। भारत की तमाम आदिवासी भाषाओं में लिखा जा रहा साहित्य हिंदी, बांग्ला, तमिल जैसी बड़ी भाषाओं में अनूदित और रूपांतरित होकर एक राष्टÑीय स्वरूप ग्रहण कर रहा है।
आदिवासी साहित्य की मूल विशेषता इसका पार्थक्य है, इसलिए इसके मूल्यांकन के लिए एक नए सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता होगी। आदिवासी साहित्य पाठक के अनुभव का विस्तार कर उसे उस भूगोल, समाज और इतिहास में ले जाता है, जिससे अधिकतर पाठक अपरिचित हैं। इसमें आई प्रकृति, परंपरागत प्रकृति चित्रण से भिन्न है। यह आदिवासी जीवन और संस्कृति का मूलाधार है। आदिवासी साहित्य जीवन-जगत के प्रति एक अलग नजरिया पेश करता है, इसलिए इसके मूल्यांकन में सतर्कता बरतनी होगी और साथ ही साथ इसे साहित्य की राजनीति से भी बचाना होगा। आदिवासी साहित्य के प्रति पत्रिकाओं, प्रकाशकों, और सबसे ज्यादा पाठकों का बढ़ता रुझान आशान्वित करता है।


साभार- जनसत्‍ता
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/38367-2013-02-07-05-28-28
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